इंदौर, 8 सितंबर 2025: इंदौर के जूनी इंदौर क्षेत्र में एक आवारा कुत्ते के काटने से 45 वर्षीय गोविंद पैवाल की रविवार सुबह एमवाय अस्पताल में मौत हो गई। इस घटना ने न केवल उनके परिवार की आर्थिक तंगी को उजागर किया है, बल्कि नगर निगम और स्वास्थ्य प्रशासन की लापरवाही पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। गोविंद का परिवार ब्रिज के नीचे रहने को मजबूर है और उनके अंतिम संस्कार के लिए भी पैसे नहीं थे। एक स्थानीय एनजीओ ने मुफ्त शव वाहन और अन्य सहायता प्रदान कर गोविंद का अंतिम संस्कार करवाया।

रैबीज की चपेट में आए गोविंद
गोविंद पैवाल, जो हरिजन कॉलोनी, जूनी इंदौर के निवासी थे, को तीन महीने पहले एक आवारा कुत्ते ने चेहरे और होंठ पर काट लिया था। वह उस समय एक ब्रिज के नीचे सो रहे थे। स्थानीय लोगों ने कुत्ते को भगा दिया, लेकिन गोविंद को तत्काल सरकारी अस्पताल में ले जाया गया, जहां उन्हें एंटी-रैबीज इंजेक्शन दिए गए। हालांकि, डॉ. आशुतोष शर्मा (सुपरिटेंडेंट, सरकारी हुकुमचंद अस्पताल) के अनुसार, एंटी-रैबीज इंजेक्शन का पूरा असर तीन डोज के बाद ही शुरू होता है। चूंकि कुत्ते ने गोविंद के चेहरे पर हमला किया था, वायरस तेजी से उनके मस्तिष्क तक पहुंच गया, जिससे उनकी स्थिति बिगड़ती चली गई।
5 सितंबर को गोविंद को हाइड्रोफोबिया (पानी से डर), एयरोफोबिया (हवा से डर), और असामान्य व्यवहार जैसे रैबीज के लक्षण दिखाई दिए। एमवाय अस्पताल में भर्ती होने के बाद उनकी हालत गंभीर हो गई। डॉक्टरों ने परिवार को पहले ही बता दिया था कि उनके बचने की संभावना नहीं है। रविवार सुबह गोविंद की रैबीज से मृत्यु हो गई।

पत्नी ने निभाया अटूट साथ
गोविंद की पत्नी संगीता ने अस्पताल के आइसोलेशन यूनिट में उनके अंतिम दिनों में उनकी पूरी सेवा की। संगीता ने बताया कि गोविंद पानी से डरने लगे थे और अजीबोगरीब हरकतें करने लगे थे। वह पागलपन की स्थिति में भी उन्हें संभालती रहीं, गले लगाकर हौसला देती रहीं, और उन्हें गाने सुनाकर शांत करने की कोशिश करती रहीं। संगीता की यह समर्पित सेवा गोविंद के अंतिम क्षणों में उनके लिए बड़ा सहारा बनी।
परिवार की आर्थिक तंगी
गोविंद का परिवार आर्थिक रूप से बेहद कमजोर है। वे ब्रिज के नीचे रहते हैं, जहां ठंड, गर्मी, और बारिश का सामना करना पड़ता है। गोविंद पहले नगर निगम के ठेकेदार के अधीन काम करते थे और मजदूरी भी करते थे। उनके परिवार में दो बेटे—अजय और एक छोटा बेटा—तथा एक बेटी है, जिसकी शादी हो चुकी है। परिवार का खर्चा चलाना मुश्किल था, और रोज का भोजन जुटाना भी एक चुनौती थी। गोविंद की मृत्यु के बाद परिवार के पास अंतिम संस्कार के लिए पैसे नहीं थे। एक स्थानीय एनजीओ ने मुफ्त शव वाहन और अन्य सहायता प्रदान कर गोविंद का अंतिम संस्कार करवाया। उनके बेटे अजय ने चिता को मुखाग्नि दी और फिर अपनी मां, छोटे भाई, और बहन को ब्रिज के नीचे छोड़कर परिवार के लिए अन्य इंतजाम में जुट गया।

प्रशासन और नगर निगम पर सवाल
इस घटना ने इंदौर नगर निगम और स्वास्थ्य प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या और कुत्ते के काटने की घटनाओं पर नियंत्रण के लिए स्पष्ट निर्देश दिए थे। नगर निगम को कुत्तों की नसबंदी कर उन्हें उसी स्थान पर छोड़ने का आदेश दिया गया था। इंदौर में पिछले कुछ वर्षों में नसबंदी अभियान चलाया गया, लेकिन इसके बावजूद कुत्ते के काटने की घटनाएं बढ़ रही हैं। हाईकोर्ट में पहले भी इस मुद्दे पर जनहित याचिकाएं दायर हो चुकी हैं, जिनमें नगर निगम को ठोस कदम उठाने के निर्देश दिए गए थे।
हुकुमचंद अस्पताल में प्रतिदिन 150 से अधिक कुत्ते के काटने के मामले दर्ज होते हैं। कई बार घाव इतने गंभीर होते हैं कि उनका इलाज चुनौतीपूर्ण हो जाता है। अस्पताल में एंटी-रैबीज इंजेक्शन का फॉलोअप नियमित रूप से होता है या नहीं, इसकी कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। मरीजों को समय पर इंजेक्शन न मिलने की स्थिति में सूचना देने का कोई तंत्र भी नहीं है, जिससे इस तरह की दुखद घटनाएं सामने आ रही हैं।
रैबीज: एक घातक बीमारी
डॉ. आशुतोष शर्मा ने बताया कि यदि कुत्ता पैर या पंजे जैसे निचले हिस्सों पर काटता है, तो एंटी-रैबीज इंजेक्शन से वायरस का असर नियंत्रित हो सकता है। लेकिन चेहरे या सिर जैसे ऊपरी हिस्सों पर काटने से वायरस तेजी से मस्तिष्क तक पहुंचता है, जिससे रैबीज जानलेवा हो जाता है। गोविंद के मामले में वायरस का तेजी से फैलाव ही उनकी मृत्यु का कारण बना। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के बाद स्थिति और स्पष्ट होगी।

परिवार की मदद की गुहार
गोविंद की मृत्यु ने उनके परिवार को गहरे संकट में डाल दिया है। परिवार का एकमात्र सहारा अब नहीं रहा, जिससे घर का खर्च चलाना और बच्चों की देखभाल करना बेहद मुश्किल हो गया है। परिजनों ने प्रशासन से आर्थिक मदद और रोजगार के अवसर प्रदान करने की मांग की है, ताकि वे इस दुखद स्थिति से उबर सकें।
निष्कर्ष
गोविंद पैवाल की मृत्यु ने इंदौर में आवारा कुत्तों की समस्या और रैबीज जैसी घातक बीमारी से निपटने में प्रशासन की नाकामी को उजागर किया है। यह घटना न केवल एक परिवार की त्रासदी है, बल्कि यह समाज और प्रशासन के लिए एक चेतावनी भी है। नगर निगम को कुत्तों की नसबंदी और उनके प्रबंधन के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। साथ ही, स्वास्थ्य विभाग को एंटी-रैबीज इंजेक्शन की उपलब्धता और फॉलोअप की व्यवस्था को मजबूत करना होगा। गोविंद के परिवार की मदद के लिए प्रशासन को तत्काल कदम उठाने की जरूरत है, ताकि उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति सुधर सके। यह घटना हमें यह भी सिखाती है कि रैबीज जैसी बीमारी के प्रति जागरूकता और समय पर इलाज कितना महत्वपूर्ण है।