सागर। दर्शनशास्त्र विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय द्वारा भारतीय दार्शनिक अनुसन्धान परिषद्, नई दिल्ली के वित्तीय सहयोग से आयोजित त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “ज्ञान, भ्रम एवं ज्ञानमीमांसीय अन्याय” का शुभारंभ 6 फरवरी, 2026 को विश्वविद्यालय के रंगनाथन भवन में किया गया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कुलपति डॉ. हरीसिंह विश्वविद्यालय, सागर प्रो. यशवंत सिंह ठाकुर ने की। मंचासीन रहे बीज वक्ता प्रो. निर्माल्य नारायण चक्रबर्ती (कुलपति, प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय, कोलकाता एवं अध्यक्ष भारतीय दार्शनिक अनुसन्धान परिषद्), मानद अतिथि प्रो. दिवाकर सिंह राजपूत (अधिष्ठाता, मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान अध्ययनशाला) संगोष्ठी निदेशक डॉ. अनिल कुमार तिवारी, समन्वयक डॉ. देबस्मिता चक्रबर्ती और आयोजन सचिव डॉ. अर्चना वर्मा।
उद्घाटन सत्र की शुरुआत मंगलाचरण और दीप प्रज्जवलन से हुई। मंचस्थ गणमान्यों ने ज्ञान की देवी मां सरस्वती और संस्थापक डॉ. सर हरीसिंह गौर की प्रतिमा पर पुष्पांजलि और माल्यार्पण किया। अतिथियों का स्वागत शाल, श्रीफल, स्मृति चिन्ह और माल्यार्पण के साथ किया गया।

संगोष्ठी निदेशक डॉ. अनिल कुमार तिवारी ने स्वागत भाषण देते हुए सभी का हार्दिक स्वागत किया और संगोष्ठी के महत्व को रेखांकित किया। इसके बाद डॉ. देबस्मिता चक्रबर्ती ने संगोष्ठी के विषय का परिचय प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि ज्ञान के स्वरूप, स्रोत, सीमा और शर्तों पर भारतीय एवं पाश्चात्य दार्शनिक परंपराओं में लंबे समय से विमर्श होता रहा है। उन्होंने ज्ञान से जुड़े समसामयिक मुद्दों और ज्ञानमीमांसीय अन्याय के समाधान के संदर्भ में संगोष्ठी के उद्देश्यों को स्पष्ट किया।
मानद अतिथि प्रो. दिवाकर सिंह राजपूत ने दर्शनशास्त्र विभाग की गतिविधियों की सराहना की और कहा कि विभाग हमेशा सार्थक और प्रेरक कार्यक्रम आयोजित करता रहा है। बीज वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए प्रो. निर्माल्य नारायण चक्रबर्ती ने ज्ञान की सीमा और उसकी सीमाओं पर भारतीय और पाश्चात्य परंपराओं में विमर्श को विस्तार से बताया। उन्होंने गार्गी-याज्ञवल्क्य संवाद का उदाहरण देते हुए तर्क और ब्रह्म के ज्ञान की सीमा की व्याख्या की।

अध्यक्ष प्रो. यशवंत सिंह ठाकुर ने कहा कि ज्ञान को शक्ति में बदलना चाहिए। उन्होंने नालंदा और तक्षशिला जैसी प्राचीन ज्ञान परंपराओं के नष्ट होने के संदर्भ में शास्त्र और शस्त्र दोनों की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने दर्शनशास्त्र विभाग के पूर्व छात्र और प्रसिद्ध दार्शनिक ओशो रजनीश के विश्वविद्यालय में प्रवेश से जुड़े रोचक प्रसंग साझा किए। इसके बाद सरस्वती वंदना हुई और आभार प्रदर्शन डॉ. अर्चना वर्मा ने किया। मंच संचालन शोधार्थी अक्षरा सिंघई और स्नातकोत्तर छात्र हिमांक चक्रवर्ती ने संयुक्त रूप से किया।

उद्घाटन सत्र में विश्वविद्यालय के अन्य विभागों से प्रो. नागेश दुबे, प्रो. अशोक अहिरवार, प्रो. बी.के. श्रीवास्तव, डॉ. संजय बरोलिया, डॉ. मोहन टी.ए., डॉ. संजय शर्मा, डॉ. विवेक जायसवाल, डॉ. अभिज्ञान द्विवेदी, डॉ. दिवाकर कुमार झा उपस्थित रहे। बाहर से पधारे विद्वतजन प्रो. अम्बिकादत्त शर्मा, प्रो. आशा मुखर्जी, प्रो. नटराजू, प्रो. शिवानी शर्मा, डॉ. विक्रम सिंह सिरोला, डॉ. अनिर्बन मुखर्जी सहित विभाग के वर्तमान एवं पूर्व शोधार्थी उपस्थित रहे।
संगोष्ठी में स्नातक और स्नातकोत्तर छात्र भी सक्रिय रूप से शामिल हुए और कार्यक्रम के सुचारू संचालन में सहयोग किया। अंत में राष्ट्रगान के साथ उद्घाटन सत्र का समापन किया गया।
इस संगोष्ठी का उद्देश्य ज्ञान, भ्रम और ज्ञानमीमांसीय अन्याय जैसे समसामयिक और दार्शनिक विषयों पर गंभीर विमर्श को बढ़ावा देना तथा विद्यार्थियों और विद्वानों में चिंतन और शोध की भावना को प्रेरित करना है।