देवास के जंगल में अर्बन नक्सल नेटवर्क की आहट!

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HOWL ग्रुप का खुलासा, आटा चक्की के नाम से हुआ था रजिस्ट्रेशन, विदेश से फंडिंग के सबूत

देवास। मध्यप्रदेश के देवास जिले के आदिवासी अंचल से सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंताजनक खबर सामने आई है। यहां सक्रिय HOWL (How Ought We Live) नामक संगठन की गतिविधियों ने पुलिस और खुफिया तंत्र को सतर्क कर दिया है। हाल ही में जुलाई के अंतिम सप्ताह में शुक्रवासा के जंगल से संगठन के संचालक सौरभ बनर्जी की गिरफ्तारी के बाद कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जो सीधे-सीधे अर्बन नक्सल नेटवर्क से मेल खाते हैं।


आटा चक्की के नाम पर रजिस्ट्रेशन

सूत्रों के अनुसार HOWL ग्रुप का रजिस्ट्रेशन एक आटा चक्की के नाम से कराया गया था। इसका मुख्य ठिकाना पर्वतपुरा पंचायत बताया गया है। लंबे समय से यह संगठन आदिवासी अंचलों में सक्रिय था और धीरे-धीरे ग्रामीणों के बीच पैठ बनाता जा रहा था।

पुलिस को बनर्जी की जब्त डायरियों से यह पता चला कि वह गांव-गांव बैठकें करने की योजना बना रहा था। इन बैठकों का एजेंडा बालाघाट के नक्सलियों की रणनीति से मेल खाता है। संगठन की गतिविधियां देवास जिले के बरोठा, शुक्रवासा, गड़वासा, रुद्रवासा, सुकल्ल्या, शिप्रा, लोहार पिपलिया, आंत, अंतरलिया, पिपलिया और पर्वतपुरा गांवों में सक्रिय रही हैं।


विदेश से फंडिंग का खुलासा

सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि HOWL ग्रुप के खाते में अमेरिका स्थित कंपनी से लाखों रुपए आए हैं। यह धनराशि ट्रांजिट अकाउंट के जरिए ट्रांसफर की गई। सिर्फ पीएनबी इंदौर ब्रांच में एक साल में 12–13 लाख रुपए का ट्रांजेक्शन पाया गया है।

पूछताछ में बनर्जी ने पहले खुद को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य के गृह मंत्री का रिश्तेदार बताया, लेकिन बाद में बयान बदल दिया। उसकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि बैंगलूरु से बीएससी (कंप्यूटर साइंस) की है और पासपोर्ट से यह भी सामने आया कि वह हांगकांग में रह चुका है।

बनर्जी का दावा है कि वह एक अनुवादक है और अमेरिका की कंपनी से लेखों के अनुवाद के लिए हर माह एक लाख रुपए पाता है। लेकिन लेन-देन की मोटाई और संदिग्धता ने पुलिस की शंका और गहरी कर दी है।


गांवों में नैरेटिव गढ़ा – “सरपंच बनाओ, काम आसान होगा”

पुलिस जांच से सामने आया कि बनर्जी ने ग्रामीणों को प्रभावित करने के लिए उनकी जमीन, सीमांकन और एससी-एसटी मामलों में अफसरों से संपर्क साधा। कुछ मामलों का हल निकलवाकर उसने आदिवासी समुदाय में अपनी पैठ बनाई और इसके बाद धर्म और राजनीति का नया नैरेटिव गढ़ा।

उसका कहना था –

“अगर अपने ही समुदाय के व्यक्ति को सरपंच या विधायक बनाओगे, तभी काम आसान होंगे।”

यही नहीं, उसने देवराज रावत नाम के व्यक्ति को चुनाव भी लड़वाया। जब पुलिस ने गहराई से पूछताछ की तो यह भी खुलासा हुआ कि बनर्जी गरीब बच्चों को पढ़ाने की बात करता था, लेकिन अपनी ही बेटी की पढ़ाई नहीं करा रहा था। इससे उसकी कथनी और करनी के बीच का फर्क उजागर हो गया।


वैमनस्य फैलाने के आरोप, बीएनएस धारा 299 में केस

पुलिस ने सौरभ बनर्जी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 299 के तहत केस दर्ज किया है। यह धारा तब लगाई जाती है जब कोई व्यक्ति धर्म, संप्रदाय या जाति के आधार पर समाज में वैमनस्य फैलाने की कोशिश करता है।


प्रशासन और पुलिस का सख्त संदेश

देवास कलेक्टर ऋतुराज सिंह ने कहा –

“शुक्रवासा के जंगल और आसपास के क्षेत्रों में आदिवासियों को बरगलाने की साजिश को नाकाम किया गया है। अगर कोई इस तरह की गतिविधि करता पाया गया तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। धर्म परिवर्तन की जानकारी हो तो प्रशासन को तत्काल सूचित करें।”

इसी तरह, पुलिस अधिकारियों का कहना है कि बनर्जी के बैंक खातों में पाए गए बड़े और संदिग्ध ट्रांजेक्शन की जांच की जा रही है। अगर विदेश से अवैध फंडिंग और नेटवर्किंग के सबूत मिलते हैं, तो कार्रवाई और कठोर होगी।


बड़ा खतरा या सामाजिक सेवा का बहाना?

फिलहाल सवाल यही है कि क्या यह संगठन केवल गरीब बच्चों को पढ़ाने और सामाजिक कार्य करने के नाम पर चलाया जा रहा था या फिर इसके पीछे वामपंथी विचारधारा को फैलाने और अर्बन नक्सल नेटवर्क को मजबूत करने की गहरी साजिश थी।

पुलिस और खुफिया एजेंसियां अब इस मामले की तह तक जाने में जुटी हैं। अगर HOWL की गतिविधियां नक्सली रणनीति से जुड़ी पाई गईं तो यह मध्यप्रदेश के लिए सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता की बड़ी चुनौती बन सकती है।

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