अमृतसर (पंजाब), 20 अगस्त 2025।
पंजाब के अमृतसर जिले के लोहगढ़ इलाके से एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया। यहां एक दादा अपने पोते को रस्सियों और संगलियों से बांधकर रिक्शे में स्कूल ले जा रहा था। बच्चे की मासूमियत और उसकी बेबसी को देखकर वहां मौजूद लोग स्तब्ध रह गए। बताया जा रहा है कि बच्चा नेत्रहीन है और बार-बार स्कूल जाने से इंकार कर रहा था।
राहगीरों ने देखा दर्दनाक दृश्य
मंगलवार सुबह लोहगढ़ इलाके से गुजर रहे लोगों की नजर जब रिक्शे पर पड़ी तो वे हैरान रह गए। रिक्शे में बैठा करीब 9-10 साल का बच्चा रो रहा था और मदद की गुहार लगा रहा था। उसके हाथ और पैर रस्सियों से बंधे हुए थे। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि यह नजारा बेहद दर्दनाक था और देखकर किसी का भी दिल पसीज जाए।

समाजसेवक ने रोका रिक्शा
स्थानीय समाजसेवक शिवम मेहता ने जब यह दृश्य देखा तो तुरंत रिक्शे का पीछा किया और दादा को रोका। उन्होंने तुरंत पुलिस को सूचना दी। पुलिस मौके पर पहुंची और बच्चे को रस्सियों से मुक्त करवाया।
दादा का पक्ष
पुलिस और समाजसेवकों द्वारा पूछे जाने पर दादा ने बताया कि पोता पिछले तीन महीनों से स्कूल जाने से इनकार कर रहा था। कई बार समझाने और डांटने के बावजूद वह स्कूल नहीं जाता था। थक-हारकर उसने उसे रस्सियों से बांधकर स्कूल ले जाने का कदम उठाया।
दादा ने यह भी कहा कि उसका मकसद बच्चे को नुकसान पहुंचाना नहीं था बल्कि उसे शिक्षा दिलाना था, लेकिन उसकी यह हरकत लोगों के गले नहीं उतरी।
पुलिस की सख्त चेतावनी
पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दादा को थाने ले जाकर सख्ती से समझाया। पुलिस अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि बच्चे के साथ इस तरह का व्यवहार न सिर्फ अमानवीय है बल्कि कानून के खिलाफ भी है। बच्चे को दोबारा रस्सियों से बांधने जैसी हरकत न करने की शर्त पर लिखित आश्वासन लेने के बाद ही पुलिस ने बच्चे को दादा के हवाले किया।

स्थानीय लोगों का आक्रोश
इस घटना के बाद इलाके में आक्रोश का माहौल है। लोगों का कहना है कि चाहे बच्चा स्कूल जाने से इनकार कर रहा हो, लेकिन उसके साथ पशुवत व्यवहार बिल्कुल अस्वीकार्य है। समाजसेवकों ने भी प्रशासन से अपील की है कि ऐसे मामलों में जागरूकता अभियान चलाए जाएं और बच्चों को पढ़ाई की ओर प्रेरित करने के लिए सकारात्मक कदम उठाए जाएं।
शिक्षा और परवरिश पर उठे सवाल
यह घटना समाज के सामने कई सवाल छोड़ गई है। एक ओर जहां शिक्षा को बच्चों का अधिकार माना जाता है, वहीं दूसरी ओर एक नेत्रहीन मासूम को स्कूल भेजने के लिए उसे रस्सियों में बांधना मानवता और संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।