बंगाल में वोटर लिस्ट SIR पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा– प्रक्रिया में रुकावट बर्दाश्त नहीं !

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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस प्रक्रिया में किसी भी तरह की रुकावट बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह टिप्पणी केवल पश्चिम बंगाल ही नहीं, बल्कि देश के सभी राज्यों के लिए लागू होगी और जरूरत पड़ने पर कोर्ट उचित आदेश जारी करेगा।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने SIR प्रक्रिया से जुड़ी कई अहम निर्देश जारी किए। कोर्ट ने बंगाल में SIR के तहत तैयार की जाने वाली फाइनल वोटर लिस्ट प्रकाशित करने की तारीख 14 फरवरी से बढ़ाकर 21 फरवरी कर दी है।

SIR नोटिस जलाने का आरोप, DGP से मांगा जवाब

सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग (EC) ने सुप्रीम कोर्ट में एक एफिडेविट दाखिल कर गंभीर आरोप लगाए। आयोग ने कहा कि पश्चिम बंगाल में कुछ बदमाशों द्वारा SIR प्रक्रिया से जुड़े नोटिस जला दिए गए हैं, लेकिन अब तक इस संबंध में कोई FIR दर्ज नहीं की गई है।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक (DGP) से जवाब तलब किया है। कोर्ट ने DGP से कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाए गए कदमों और अब तक की कार्रवाई की विस्तृत जानकारी मांगी है।

सुप्रीम कोर्ट के दो अहम निर्देश

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दो महत्वपूर्ण निर्देश भी जारी किए—

  1. पश्चिम बंगाल सरकार को मंगलवार शाम 5 बजे तक उन 8,505 अधिकारियों की सूची सुप्रीम कोर्ट में जमा करने का निर्देश दिया गया है, जिन्हें वह SIR प्रक्रिया में तैनात करने का प्रस्ताव दे रही है।
    साथ ही चुनाव आयोग को EROs (इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स) और AEROs (असिस्टेंट EROs) को बदलने तथा आवश्यकता पड़ने पर इन अधिकारियों की सेवाएं लेने का अधिकार दिया गया है।
  2. कोर्ट ने कहा कि बाकी अधिकारियों में से चुनाव आयोग बायोडाटा की जांच के बाद, पहले से तैनात माइक्रो-ऑब्जर्वर्स की संख्या के बराबर अधिकारियों को शॉर्टलिस्ट कर सकता है। इन्हें EROs, AEROs और माइक्रो-ऑब्जर्वर्स की सहायता के लिए सीमित प्रशिक्षण दिया जा सकता है। हालांकि, अंतिम निर्णय लेने का अधिकार केवल EROs के पास ही रहेगा।

4 फरवरी की सुनवाई: ममता बनर्जी ने खुद रखी दलीलें

इस मामले की सुनवाई 4 फरवरी को भी हुई थी, जो सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में खास रही। पहली बार किसी राज्य की मौजूदा मुख्यमंत्री ने स्वयं सुप्रीम कोर्ट में पेश होकर दलीलें रखीं। आमतौर पर ऐसे मामलों में मुख्यमंत्री के वकील या कानूनी सलाहकार ही अदालत में पेश होते हैं।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोर्ट में आरोप लगाया था कि चुनाव आयोग पश्चिम बंगाल को जानबूझकर निशाना बना रहा है। उन्होंने कहा कि चुनाव से ठीक दो महीने पहले ऐसी प्रक्रिया शुरू की जा रही है, जिसे सामान्य तौर पर दो साल में पूरा किया जाता है।

EC और राज्य सरकार के बीच टकराव

चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने कोर्ट को बताया था कि राज्य सरकार ने SIR प्रक्रिया की निगरानी के लिए केवल 80 ग्रेड-2 अधिकारियों की व्यवस्था की है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए ज्यादातर निम्न-स्तरीय कर्मचारी, जैसे आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को लगाया गया।

इस पर ममता बनर्जी ने आयोग के आरोपों का खंडन करते हुए कहा था कि राज्य सरकार ने वही संसाधन और अधिकारी उपलब्ध कराए हैं, जिनकी मांग चुनाव आयोग ने की थी।

‘बंगाल को किया जा रहा है टारगेट’

मुख्यमंत्री ने कोर्ट में कहा था कि खेती-किसानी के मौसम में इस तरह की कवायद से आम लोग परेशान हो रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि 24 साल बाद यह प्रक्रिया सिर्फ तीन महीने में पूरी करने की इतनी जल्दबाजी क्यों की जा रही है।

ममता बनर्जी ने यह भी दावा किया कि SIR प्रक्रिया के दबाव में 100 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है और चुनाव आयोग की प्रताड़ना के चलते BLO (बूथ लेवल ऑफिसर्स) की भी मौतें हो रही हैं। उन्होंने कहा कि असम और नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों में ऐसी कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही, जबकि बंगाल को लगातार निशाना बनाया जा रहा है।

अगली सुनवाई पर टिकी निगाहें

अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा मांगी गई रिपोर्ट और सूचनाओं के बाद अगली सुनवाई में मामले की दिशा तय होने की संभावना है। कोर्ट का सख्त रुख साफ संकेत देता है कि वोटर लिस्ट रिवीजन प्रक्रिया को लेकर किसी भी तरह की लापरवाही या बाधा को गंभीरता से लिया जाएगा।

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