सागर जिले के बीना नगर के सुभाष वार्ड स्थित ग्वालटोली में बुधवार रात पारंपरिक लट्ठमार होली का भव्य आयोजन किया गया। ग्वाल समाज द्वारा आयोजित इस अनोखी होली को देखने के लिए नगर के साथ-साथ आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। रंग, ढोल और फाग गीतों के बीच देर रात तक यह आयोजन उत्साह और उमंग के साथ चलता रहा।
महिलाओं ने लाठियों से किया प्रतीकात्मक प्रहार
लट्ठमार होली की सबसे खास बात यह है कि इसमें महिलाएं पुरुषों पर लाठियों से प्रहार करती हैं, जबकि पुरुष ढाल या अन्य तरीकों से अपना बचाव करते हैं। इस खेल को देखने के लिए हर साल बड़ी संख्या में लोग ग्वालटोली पहुंचते हैं।
बुधवार रात भी महिलाओं ने पारंपरिक अंदाज में पुरुषों पर लाठियां बरसाईं और पुरुष हंसी-मजाक के बीच उनका सामना करते नजर आए। लाठियों और रंगों के बीच युवक झूमते हुए नजर आए और पूरा माहौल उत्सवमय बना रहा।
वर्षों पुरानी परंपरा

ग्वाल समाज के लोगों का कहना है कि यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और हर साल होली के मौके पर बड़े उत्साह के साथ आयोजित की जाती है। यह आयोजन मथुरा के बरसाना में खेले जाने वाली प्रसिद्ध लट्ठमार होली से प्रेरित माना जाता है।
पंडा और शेलू यादव ने बताया कि ग्वाल यादव समाज में यह परंपरा लंबे समय से निभाई जा रही है। उनका कहना है कि इस तरह की होली खेलने से समाज में आपसी प्रेम और भाईचारा बढ़ता है।
रिश्तों में प्रेम का प्रतीक
इस अनोखी होली में रिश्तों की मस्ती भी देखने को मिलती है। आयोजन के दौरान समधन समधी पर, सरहज नंदोई पर, साली जीजा पर और भाभी देवर पर लाठियां बरसाकर अपने स्नेह और अपनापन का प्रतीकात्मक प्रदर्शन करती हैं।
इस दौरान महिलाएं और पुरुष पारंपरिक फाग गीत भी गाते हैं, जिससे पूरा माहौल ब्रज की होली जैसा प्रतीत होने लगता है। ढोलक और मंजीरे की धुन पर लोग झूमते हुए नजर आए।
कभी-कभी लग जाती है चोट

खेल के दौरान कई बार पुरुष पूरी तरह बचाव नहीं कर पाते और हल्की-फुल्की चोट भी लग जाती है। इसके बावजूद लोग पूरे उत्साह के साथ इस परंपरा में भाग लेते हैं और इसे आनंद का हिस्सा मानते हैं।
भगवान कृष्ण काल से जुड़ी है परंपरा
लट्ठमार होली की परंपरा को भगवान कृष्ण और राधा की कथा से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि राधा का निवास बरसाना में था, जबकि भगवान कृष्ण नंदगांव में रहते थे। होली के समय कृष्ण अपने मित्रों के साथ बरसाना पहुंचते थे और राधा व उनकी सखियों के साथ रंग-गुलाल खेलते थे।
इस दौरान राधा और उनकी सखियां कृष्ण और उनके साथियों पर लाठियां बरसाती थीं। इसे प्रेम और हंसी-मजाक का प्रतीक माना जाता था। तभी से बरसाना और नंदगांव में लट्ठमार होली खेलने की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी देश के कई हिस्सों में निभाई जाती है।
बड़ी संख्या में पहुंचे दर्शक

बीना की ग्वालटोली में आयोजित इस कार्यक्रम को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। देर रात तक लोग रंगों, संगीत और हंसी-मजाक के बीच इस अनोखी परंपरा का आनंद लेते रहे।
इस तरह बीना में लट्ठमार होली का यह आयोजन न केवल एक पारंपरिक उत्सव बना, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत को भी जीवंत करने का माध्यम साबित हुआ।