भगवाँ (छतरपुर): रविवार की वह काली रात रमजान खान और उनकी गर्भवती पत्नी मुनाफा खान के लिए जीवनभर का दर्द बनकर रह गई। डिलीवरी के तीव्र पीड़ा में कराहती मुनाफा को जब परिजनों ने भगवाँ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुँचाया, तो वहाँ न तो कोई डॉक्टर था, न ही कोई नर्स। बस, सन्नाटा था और एक गूँगी व्यवस्था, जिसने एक और माँ की जान जोखिम में डाल दी।

“कई घंटे इंतज़ार किया… कोई नहीं आया!”
रमजान खान की आवाज़ भर्राई हुई है, आँखें ग़ुस्से और बेबसी से लाल। वे बताते हैं, “रात 8 बजे अस्पताल पहुँचे, लेकिन गेट बंद था। चिल्लाए, दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन जवाब देने वाला कोई नहीं था। मेरी बीवी की हालत बिगड़ रही थी, वह चीख रही थी… मैं बस देखता रह गया।” अंततः परिजनों को मुनाफा को निजी क्लिनिक ले जाना पड़ा, जहाँ उन्होंने प्रसव कराया। लेकिन यह सवाल अब तक उनके दिल में चुभ रहा है: “अगर कुछ बुरा हो जाता, तो जिम्मेदार कौन होता?”
“यह पहली बार नहीं… प्रशासन की नींद हमेशा गहरी होती है!”
स्थानीय ग्रामीणों का आक्रोश साफ़ झलकता है। श्यामू अहिरवार कहते हैं, “यहाँ डॉक्टर आते ही नहीं। दिन में भी स्टाफ गायब रहता है। ग़रीबों की जान का कोई मोल नहीं।” पिछले छह महीनों में यह तीसरी घटना है, जब भगवाँ अस्पताल में मरीज़ों को डॉक्टरों के बिना लौटना पड़ा।

CMHO का बयान: “जाँच होगी, वेतन रोका जाएगा”
मामले पर संज्ञान लेते हुए छतरपुर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMHO) डॉ. आर. पी. गुप्ता ने कहा, “यह गंभीर आरोप है। वीडियो सामने आया है, जिसमें अस्पताल खाली दिख रहा है। दोषियों का वेतन रोककर कार्रवाई की जाएगी।” लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ़ वेतन रोकने से बदलेगी तस्वीर? जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसी घटनाएँ थमेंगी नहीं।
“सिस्टम की निष्ठुरता का शिकार हुए हम”
रमजान की आँखों में अब भी डर है। “मेरी बीवी और बच्चा बच गए, लेकिन अगली बार किसकी बारी होगी?” उनकी यह पीड़ा सिर्फ़ एक परिवार की नहीं, बल्कि उस पूरे समाज की है, जहाँ ग़रीबों का इलाज सरकारी फाइलों की भेंट चढ़ जाता है।

अब प्रशासन के सामने सवाल है: क्या भगवाँ अस्पताल में डॉक्टरों की तैनाती सुनिश्चित होगी, या फिर एक और मौत के बाद ही कोई हरकत होगी? ग्रामीणों की नज़र अब बड़ामलहरा एसडीएम पर है, जिनसे अपेक्षा की जा रही है कि वे इस मामले में ठोस हस्तक्षेप करेंगे।
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