सागर | मकर संक्रांति के पावन अवसर पर मंगलवार को सागर में धार्मिक आस्था और सामाजिक सेवा का अनूठा संगम देखने को मिला। रामसरोज समूह के समाजसेवी संजीव केसरवानी, शैलेश केसरवानी और अखिलेश मोनी केसरवानी के नेतृत्व में त्रिवेणी संगम प्रयागराज के पवित्र जल का पूजन-अर्चन कर सागर नगरवासियों में गंगाजल, खिचड़ी और लड्डुओं का वितरण किया गया।
इस अवसर पर बड़ी संख्या में नागरिकों ने श्रद्धा के साथ संगम जल ग्रहण किया और मकर संक्रांति के पुण्य लाभ प्राप्त किए। आयोजन स्थल पर भक्ति और उल्लास का वातावरण बना रहा।
शास्त्रों में मकर संक्रांति का विशेष महत्व
कार्यक्रम में उपस्थित नर्मदा भक्त गृहस्थ संत पंडित केशव गोस्वामी महाराज ने शास्त्रों के अनुसार मकर संक्रांति के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इस दिन गंगा या संगम में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। जो लोग किसी कारणवश संगम तक नहीं पहुंच पाते, उनके लिए संगम का जल लेना भी गंगा स्नान के समान पुण्यदायी माना गया है।

हर व्यक्ति तक पहुंचे पुण्य लाभ—संजीव केसरवानी
समाजसेवी संजीव केसरवानी ने कहा कि हर व्यक्ति के लिए प्रयागराज जाकर पवित्र नदी में स्नान करना संभव नहीं हो पाता। इसी भावना के साथ रामसरोज समूह ने त्रिवेणी संगम का जल सागर लाकर नगरवासियों को उपलब्ध कराया है, ताकि सभी लोग मकर संक्रांति के आध्यात्मिक लाभ से वंचित न रहें। उन्होंने जानकारी दी कि बुधवार को चकराघाट प्रांगण में भी गंगाजल और लड्डुओं का वितरण किया जाएगा।
उत्तरायण का पर्व, आध्यात्मिक उन्नति का अवसर
समाजसेवी शैलेश केसरवानी ने कहा कि मकर संक्रांति पर पवित्र जल से स्नान करने का विशेष महत्व है और समूह का प्रयास है कि यह सुविधा अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे। वहीं अखिलेश मोनी केसरवानी ने कहा कि मकर संक्रांति उत्तरायण की शुरुआत का प्रतीक है, जो आत्मिक शुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। त्रिवेणी संगम और गंगाजल से स्नान करने से जीवन में सकारात्मक बदलाव और मानसिक शांति प्राप्त होती है।
बड़ी संख्या में श्रद्धालु रहे उपस्थित
इस सेवा और श्रद्धा के आयोजन में किन्नर समाज की रानी ठाकुर, आरआर पाराशर, पुष्पेंद्र सिंह कर्रापुर, सुरेंद्र चावड़ा, डॉ. हेमंत लारिया, मनोज गुप्ता, मूरत पटेल, रजनीश कुशवाहा सहित बड़ी संख्या में नागरिक, मातृशक्ति और श्रद्धालु उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के माध्यम से रामसरोज समूह ने यह संदेश दिया कि धार्मिक परंपराओं के साथ समाजसेवा भी उतनी ही आवश्यक है, और सामूहिक प्रयासों से आस्था को जन-जन तक पहुंचाया जा सकता है।