लोहड़ी: अग्नि, आस्था और आत्मीयता का पर्व — वीरता, कृषि और सामाजिक समरसता का जीवंत उत्सव – डॉ. संदीप सबलोक !

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भारत ऋतुओं और त्योहारों का देश है, जहाँ हर पर्व प्रकृति के परिवर्तन, सामाजिक चेतना और मानवीय भावनाओं से गहराई से जुड़ा होता है। उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब की सांस्कृतिक पहचान लोहड़ी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि कड़ाके की ठंड में जीवन की ऊष्मा, रबी की फसल की आहट और अन्याय के विरुद्ध साहस के उद्घोष का प्रतीक है। पौष माह की अंतिम रात्रि को जलने वाला अलाव न सिर्फ ठंड को मात देता है, बल्कि सामाजिक जड़ता, ईर्ष्या और नकारात्मकता को भस्म करने का संदेश भी देता है।


दुल्ला भट्टी: नारी सम्मान और शौर्य की अमर गाथा

लोहड़ी की आत्मा में पंजाब के लोकनायक दुल्ला भट्टी का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। मुगल काल में जब अन्याय और शोषण आम था, तब दुल्ला भट्टी ने अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष कर नारी सम्मान की रक्षा की। लोककथाओं के अनुसार उन्होंने ‘सुंदरी’ और ‘मुंदरी’ नामक दो अनाथ कन्याओं को गुलामी से मुक्त कराया और स्वयं उनका धर्म-पिता बनकर समाज की स्वीकृति के साथ उनका विवाह कराया।
आज भी लोहड़ी के गीतों में— “सुंदर मुंदरिये हो… दुल्ला भट्टी वाला हो”— की गूंज, यह याद दिलाती है कि वीरता का सच्चा अर्थ मजलूमों की रक्षा है।


कृषि परंपरा और आस्था का उत्सव

लोहड़ी का गहरा नाता कृषि जीवन से है। यह रबी की फसल, विशेषकर गन्ना और सरसों की कटाई के समय मनाई जाती है। इस दिन अग्नि देव और सूर्य देव की आराधना कर लोग अलाव के चारों ओर परिक्रमा करते हैं और उसमें मूंगफली, रेवड़ी, गजक, पॉपकॉर्न, तिल और गुड़ अर्पित करते हैं। यह आहुति समृद्धि, अच्छी फसल और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक मानी जाती है।
रात को मक्की की रोटी और सरसों का साग लोहड़ी के स्वाद को पूर्णता प्रदान करता है।


लोकगीत, बाल टोलियां और सामाजिक जुड़ाव

लोहड़ी के बिना लोकगीतों की कल्पना अधूरी है। बच्चे घर-घर जाकर “दे माई लोहड़ी, तेरी जीवे जोड़ी” गाते हैं, जो सामाजिक सौहार्द और आपसी प्रेम का प्रतीक है। इन गीतों में मनोरंजन के साथ-साथ मिट्टी से जुड़ाव और बुजुर्गों के प्रति सम्मान भी झलकता है।


नव-विवाहित और नवजात की लोहड़ी

जिस घर में नई बहू आती है या नवजात शिशु का जन्म होता है, वहाँ लोहड़ी विशेष उत्सव बन जाती है। नई बहू द्वारा अग्नि पूजन और नवजात की पहली लोहड़ी पर ‘मंगण’ की रस्म परिवार और समाज में नए जीवन के स्वागत का भावनात्मक प्रतीक है। ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्धा खुशियों को सामूहिक रूप देते हैं।


बदलती सोच: बेटियों की भी लोहड़ी

समय के साथ परंपराएं भी बदल रही हैं। पहले जहाँ लोहड़ी मुख्यतः पुत्र जन्म पर मनाई जाती थी, वहीं अब बेटियों की लोहड़ी भी पूरे उत्साह से मनाई जा रही है। यह सामाजिक बदलाव लैंगिक समानता और नारी सम्मान का सशक्त संदेश देता है, जो दुल्ला भट्टी की सोच को आधुनिक संदर्भ में जीवंत करता है।


तनाव मुक्त जीवन और वैश्विक पहचान

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोहड़ी सामूहिक उल्लास और मानसिक सुकून का पर्व है। अलाव के चारों ओर बैठकर पुराने गिले-शिकवे धुएँ की तरह उड़ जाते हैं और रिश्तों में तिल-गुड़ की मिठास घुल जाती है।
पंजाब की सीमाओं से निकलकर यह पर्व अब देश-विदेश तक फैल चुका है। कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में बसे प्रवासी भारतीय भी ढोल की थाप पर लोहड़ी मनाकर अपनी सांस्कृतिक जड़ों को जीवित रखे हुए हैं।


लोहड़ी: विश्वास, विजय और उल्लास का संगम

मकर संक्रांति से एक दिन पहले, 13 जनवरी को मनाई जाने वाली लोहड़ी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि रिश्तों की गर्माहट से सर्दियों की ठिठुरन को हराने वाला उत्सव है। यह हमें प्रकृति का सम्मान करना, वीरों को स्मरण करना और नई पीढ़ी का खुले दिल से स्वागत करना सिखाती है।
लोहड़ी की पवित्र अग्नि में आइए, हम ईर्ष्या और भेदभाव की आहुति दें और प्रेम, मानवता व भाईचारे के उजाले को चारों ओर फैलाएं।

ब्यूरो रिपोर्ट रिपब्लिक सागर मीडिया
संवाददाता – अर्पित सेन
7806077338, 9109619237

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