संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल में इलाज में देरी से 13 वर्षीय मनीष साहू की मौत — जांच रिपोर्ट में विभागीय तालमेल की कमी उजागर !

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रीवा, 9 अक्टूबर 2025 — रीवा के संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल (SGMH) में 5 दिन भर्ती रहे मनीष साहू (13) की इलाज में देरी के बाद मृत्यु हो गई। मनीष महोबा का रहने वाला था और 30 अगस्त 2025 को आकाशीय बिजली की चपेट में आने के बाद झुलसा था। पन्ना जिला अस्पताल में इलाज के बाद उसे गंभीर परिस्थितियों में रीवा रेफर किया गया था। परिजन उसे 3 अक्टूबर 2025 को SGMH लाए थे।


घटना का क्रम (सारांश)

  • 30 अगस्त 2025: मनीष बिजली गिरने से झुलसा; पन्ना अस्पताल में भर्ती।
  • 3 अक्टूबर 2025: परिजन मनीष को रीवा के संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल लेकर पहुंचे।
  • अस्पताल पहुंचने पर परिजन हाथ में ड्रिप की बोतल लिये स्ट्रेचर पर बच्चे को लिए भटकते रहे; स्टाफ ने उन्हें पहले बर्न-वार्ड भेजा, वहाँ भर्ती नहीं की गई। बाद में 7 नंबर वार्ड भेजा गया — वहां भी भर्ती नहीं हुई।
  • अस्पताल की आंतरिक जांच रिपोर्ट में कहा गया कि विभागों के बीच समन्वय की कमी के कारण मनीष का इलाज लगभग 2 घंटे लेट शुरू हुआ। उस देरी के दौरान परिजन परेशान रहे; अंततः कई मिन्नतों के बाद ही बच्चे को ड्रिप दी गई — ड्रिप मनीष की दादी ने खुद पकड़ रखी थी।
  • परिवार ने शिकायत सीएम हेल्पलाइन पर दी; इसके बाद ही मनीष को वार्ड में दाखिल किया गया, पर तब तक उसकी हालत गंभीर रूप से बिगड़ चुकी थी। कुछ दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई।

जांच रिपोर्ट और अस्पताल की घोषणा

  • अस्पताल अधीक्षक डॉ. राहुल मिश्रा ने मीडिया में उठने पर तीन सदस्यों की जांच टीम बनाई। टीम की रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इलाज शुरू करने में विभागीय समन्वय की भारी कमी रही, जिसकी कीमत बच्चे को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।
  • रिपोर्ट ने देरी और प्राथमिक इमरजेंसी-प्रोटोकॉल की अनुपालना में खामियों की बात कही है, लेकिन जांच रिपोर्ट में अभी तक किसी कर्मचारी के विरुद्ध सीधे सजा या निलंबन का उल्लेख नहीं किया गया।
  • प्रशासनिक स्तर पर अधीक्षक ने कहा है कि विभागों के बीच समन्वय स्थापित करने और व्यवस्थाएँ सुधारने के लिए कार्रवाई की जा रही है; पर रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद भी जिम्मेदार अधिकारियों पर तत्काल अगर-जांच/अनुशासनात्मक कार्रवाई के स्पष्ट विवरण नहीं दिए गए हैं।

परिवार की स्थिति और पार्श्वभूमि

  • मनीष का परिवार बचपन से आर्थिक और स्वास्थ्य चुनौती झेल रहा था; उसे प्राथमिक इलाज पन्ना में मिला और बाद में गंभीर हालत में रीवा रेफर किया गया था। अस्पताल में प्रवेश के समय परिजनों की हालत चिंताजनक थी — वे स्ट्रेचर पर बच्चे को ले कर भटकते रहे और ड्रिप-बॉटल हाथ में लेकर खड़े रहे।
  • परिजनों ने बताया कि प्राथमिक उपचार में देरी और अस्पताल के रवैये ने उन्हें मजबूर और लाचार महसूस कराया।

निहित प्रश्न और प्रशासनिक/कानूनी पहलू

  1. तत्काल चिकित्सा (triage) और इमरजेंसी-प्रोटोकॉल का उल्लंघन: गंभीर रूप से घायल/झुलसे मरीजों को प्राथमिक रूप से इमरजेंसी में stabilization और वॉलेट/फॉर्मैलिटी से ऊपर प्राथमिक चिकित्सा दी जानी चाहिए। रिपोर्ट बताती है कि यह पालन नहीं हुआ।
  2. जिम्मेदारी का निर्धारण और पारदर्शिता: जांच में त्रुटि पाई गई है — अब यह स्पष्ट होना चाहिए कि किन विभागों/कर्मचारियों की जवाबदेही तय की जा रही है और क्या अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी।
  3. हाई-लेवल ऑडिट और मोनिटरिंग: इस तरह के मामलों को रोकने के लिए अस्पताल की इमरजेंसी प्रक्रियाओं का बाहरी ऑडिट व नियमित निरीक्षण आवश्यक है।
  4. रिपोर्टिंग और परिवार के अधिकार: मृतक परिवार को जांच रिपोर्ट की कॉपी, होने वाली कार्रवाई का विवरण और यदि हो तो मुआवजा/पुनर्वास की जानकारी प्रदान की जानी चाहिए।

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