सागर। नए शिक्षा सत्र की शुरुआत के साथ हर साल निजी स्कूलों पर महंगी किताबें और कॉपियां एक ही स्थान से खरीदवाने के आरोप लगते हैं। इस वर्ष भी हालात ज्यादा अलग नहीं रहे। जिला प्रशासन द्वारा आयोजित पुस्तक मेला भी अपेक्षित राहत नहीं दे सका, जिससे कई नामी स्कूलों के विद्यार्थियों को समय पर सभी विषयों की किताबें नहीं मिल पाईं।
इसी बीच सागर शहर और मकरोनिया क्षेत्र के तीन निजी स्कूलों ने एक सकारात्मक और प्रेरणादायक पहल करते हुए ‘बुक बैंक’ की शुरुआत की। सत्र प्रारंभ होने से पहले ही, जैसे ही वार्षिक परीक्षा परिणाम घोषित हुए, स्कूल प्रबंधन ने अभिभावकों से अपील की कि वे अपने बच्चों की पुरानी किताबें स्कूल में जमा कर दें, ताकि जरूरतमंद छात्रों को उपलब्ध कराई जा सकें।
स्कूलों ने यह सुविधा भी दी कि अभिभावक चाहें तो स्कूल आकर अपने बच्चों के लिए पुरानी किताबें चुन सकते हैं या आपस में संपर्क कर किताबों का आदान-प्रदान कर सकते हैं। इस पहल से करीब एक हजार विद्यार्थियों को सीधा लाभ मिला।
आर्थिक स्थिति ने दिया विचार को जन्म
सुंदरलाल श्रीवास्तव मेमोरियल हायर सेकंडरी स्कूल के संचालक डॉ. अजय श्रीवास्तव ने बताया कि अभिभावकों की आर्थिक परेशानियों को देखते हुए यह विचार आया। उन्होंने बच्चों को भी प्रेरित किया कि वे अपनी पुरानी किताबें जूनियर छात्रों को दें और सीनियर छात्रों से किताबें लें। इससे न केवल आर्थिक राहत मिलती है, बल्कि कागज की बचत भी होती है।

दीपक मेमोरियल एकेडमी की प्राचार्या डॉ. रितु जायसवाल के अनुसार, सत्र शुरू होने से पहले ही विद्यार्थियों को संदेश भेजकर किताबें दान करने और जरूरत पड़ने पर लेने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इस पहल में 700 से अधिक छात्रों ने भाग लिया।
ब्लू बेल्स फाउंडेशन स्कूल की प्राचार्या सुजाता मलैया ने बताया कि पाठ्यक्रम में बदलाव न होने के कारण यह योजना और भी सफल रही। कई अभिभावकों ने आपस में किताबों का आदान-प्रदान किया, जबकि स्कूल में जमा किताबें जरूरतमंद छात्रों को वितरित की गईं।
‘बुक बैंक’ अभियान को मिलेगा विस्तार
पालक महासंघ के प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ. धरणेंद्र जैन ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि सभी निजी स्कूलों को ‘बुक बैंक’ शुरू करना चाहिए। इससे अभिभावकों के खर्च में कमी आएगी और पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलेगी। उन्होंने बताया कि इस दिशा में एक अभियान चलाया जाएगा और जिला प्रशासन से भी इस व्यवस्था को अनिवार्य करने की मांग की जाएगी।
जिला शिक्षा अधिकारी अरविंद जैन ने भी इस पहल को सराहनीय बताते हुए कहा कि जल्द ही सभी निजी स्कूलों को ‘बुक बैंक’ स्थापित करने के निर्देश दिए जाएंगे।
अभिभावकों को मिल रही राहत
नर्सरी से लेकर 12वीं तक की किताबों पर हर साल 500 से 2000 रुपये तक का खर्च आता है, जो कॉपियों के साथ और बढ़ जाता है। ऐसे में इस पहल से अभिभावकों को आर्थिक राहत मिली है। एक अभिभावक प्रवीण सिंह ने बताया कि उन्होंने अपने बच्चे की पुरानी किताबें दान कीं और बदले में अन्य छात्रों से किताबें लेकर लगभग 600 रुपये की बचत की।
यह पहल न केवल जरूरतमंद छात्रों के लिए मददगार साबित हो रही है, बल्कि अन्य स्कूलों के लिए भी एक प्रेरणादायक उदाहरण बन रही है।