हाईकोर्ट ने नाबालिग पीड़िता के गर्भपात पर लगाई रोक :

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जबलपुर। जबलपुर हाईकोर्ट ने एक नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता के गर्भपात की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) कानून के तहत गर्भपात के लिए गर्भवती महिला की सहमति आवश्यक है। इस मामले में नाबालिग पीड़िता और उसकी मां, दोनों ने गर्भपात कराने से इंकार कर दिया।


मैहर में हुई थी घटना, आरोपी गिरफ्तार

मामला सतना जिले के मैहर का है। यहां एक नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म हुआ था, जिसके बाद वह गर्भवती हो गई। पुलिस ने आरोपी युवक को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। केस की सुनवाई के दौरान जांच में सामने आया कि पीड़िता का गर्भ 28 सप्ताह से अधिक का हो चुका है।

मैहर जिला न्यायालय ने इस स्थिति की जानकारी हाईकोर्ट को दी और मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट भी प्रस्तुत की।


पीड़िता ने कहा – शादी हो चुकी है

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा के समक्ष पीड़िता और उसकी मां ने बयान दिया। उन्होंने कहा कि पीड़िता ने आरोपी युवक से शादी कर ली है और अब वह गर्भपात नहीं चाहती। पीड़िता ने यह भी मांग की कि उसके पति को जेल से रिहा किया जाए।


मेडिकल रिपोर्ट अधूरी पाई गई

जस्टिस मिश्रा ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर भी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि बोर्ड को अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख करना चाहिए कि –

  • गर्भ जारी रहने से मां की जान या स्वास्थ्य को कोई गंभीर खतरा है या नहीं।
  • जन्म लेने वाले शिशु में कोई गंभीर बीमारी या शारीरिक कमी तो नहीं होगी।

कोर्ट ने कहा कि अधूरी जानकारी से न्यायालय को निर्णय लेने में कठिनाई होती है।


कानून का हवाला देकर अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने कहा कि MTP अधिनियम, 1971 (संशोधित) के अनुसार गर्भपात तभी संभव है जब –

  • गर्भवती महिला की सहमति प्राप्त हो।
  • गर्भ 24 सप्ताह तक का हो।

चूंकि पीड़िता और उसकी मां गर्भपात के खिलाफ हैं और गर्भ 28 सप्ताह से अधिक हो चुका है, इसलिए अदालत ने गर्भपात की अनुमति नहीं दी।


आदेश की प्रति सभी जिलों में भेजी जाएगी

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि इस फैसले की प्रति प्रदेश के सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों और राज्य मेडिकल बोर्ड को भेजी जाए। ताकि भविष्य में ऐसे मामलों में मेडिकल रिपोर्ट विस्तृत और स्पष्ट रूप से तैयार की जा सके और अदालत को सटीक तथ्य उपलब्ध हों।


कानूनी और सामाजिक पहलू

यह मामला कई सवाल खड़े करता है –

  • नाबालिग होने के बावजूद पीड़िता और आरोपी की शादी को लेकर उठने वाले कानूनी विवाद।
  • दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध में पीड़िता द्वारा आरोपी की रिहाई की मांग।
  • और सबसे महत्वपूर्ण – कानून और सामाजिक परिस्थितियों के बीच फंसी पीड़िता और उसके परिवार की स्थिति।

जबलपुर। जबलपुर हाईकोर्ट ने एक नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता के गर्भपात की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) कानून के तहत गर्भपात के लिए गर्भवती महिला की सहमति आवश्यक है। इस मामले में नाबालिग पीड़िता और उसकी मां, दोनों ने गर्भपात कराने से इंकार कर दिया।


मैहर में हुई थी घटना, आरोपी गिरफ्तार

मामला सतना जिले के मैहर का है। यहां एक नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म हुआ था, जिसके बाद वह गर्भवती हो गई। पुलिस ने आरोपी युवक को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। केस की सुनवाई के दौरान जांच में सामने आया कि पीड़िता का गर्भ 28 सप्ताह से अधिक का हो चुका है।

मैहर जिला न्यायालय ने इस स्थिति की जानकारी हाईकोर्ट को दी और मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट भी प्रस्तुत की।


पीड़िता ने कहा – शादी हो चुकी है

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा के समक्ष पीड़िता और उसकी मां ने बयान दिया। उन्होंने कहा कि पीड़िता ने आरोपी युवक से शादी कर ली है और अब वह गर्भपात नहीं चाहती। पीड़िता ने यह भी मांग की कि उसके पति को जेल से रिहा किया जाए।


मेडिकल रिपोर्ट अधूरी पाई गई

जस्टिस मिश्रा ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर भी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि बोर्ड को अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख करना चाहिए कि –

  • गर्भ जारी रहने से मां की जान या स्वास्थ्य को कोई गंभीर खतरा है या नहीं।
  • जन्म लेने वाले शिशु में कोई गंभीर बीमारी या शारीरिक कमी तो नहीं होगी।

कोर्ट ने कहा कि अधूरी जानकारी से न्यायालय को निर्णय लेने में कठिनाई होती है।


कानून का हवाला देकर अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने कहा कि MTP अधिनियम, 1971 (संशोधित) के अनुसार गर्भपात तभी संभव है जब –

  • गर्भवती महिला की सहमति प्राप्त हो।
  • गर्भ 24 सप्ताह तक का हो।

चूंकि पीड़िता और उसकी मां गर्भपात के खिलाफ हैं और गर्भ 28 सप्ताह से अधिक हो चुका है, इसलिए अदालत ने गर्भपात की अनुमति नहीं दी।


आदेश की प्रति सभी जिलों में भेजी जाएगी

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि इस फैसले की प्रति प्रदेश के सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों और राज्य मेडिकल बोर्ड को भेजी जाए। ताकि भविष्य में ऐसे मामलों में मेडिकल रिपोर्ट विस्तृत और स्पष्ट रूप से तैयार की जा सके और अदालत को सटीक तथ्य उपलब्ध हों।


कानूनी और सामाजिक पहलू

यह मामला कई सवाल खड़े करता है –

  • नाबालिग होने के बावजूद पीड़िता और आरोपी की शादी को लेकर उठने वाले कानूनी विवाद।
  • दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध में पीड़िता द्वारा आरोपी की रिहाई की मांग।
  • और सबसे महत्वपूर्ण – कानून और सामाजिक परिस्थितियों के बीच फंसी पीड़िता और उसके परिवार की स्थिति।

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