11 साल का आरव पढ़ाए 9वीं के बच्चे, हाईकोर्ट ने दिया अल्टीमेटम:

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सीबीएसई और स्कूल को 15 दिन में करानी होगी परीक्षा, पास होने पर 10वीं में मिलेगा दाखिला

जबलपुर। आमतौर पर जहां बच्चे 15-16 साल की उम्र में 10वीं कक्षा में पहुंचते हैं, वहीं जबलपुर का 11 वर्षीय आरव सिंह पटेल अपने टैलेंट के दम पर इस उम्र में ही 10वीं की दहलीज पर खड़ा है। लेकिन उसकी उम्र ने उसकी राह रोक दी। स्कूल ने 10वीं में एडमिशन देने से मना किया, तो परिवार ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अब हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि 15 दिन के भीतर आरव की 9वीं की परीक्षा कराई जाए और पास होने पर उसे 10वीं में दाखिला दिया जाए।


कोर्ट का आदेश

हाईकोर्ट ने सीबीएसई चेयरमैन और जबलपुर के सेंट जोसेफ स्कूल प्रबंधन को निर्देश दिया है कि—

  • 15 दिन तक आरव को स्कूल में देखरेख में रखा जाए।
  • तीन विशेषज्ञों (जिसमें साइकेट्रिस्ट भी शामिल होंगे) का एक मेडिकल बोर्ड गठित किया जाए।
  • बोर्ड बच्चे की रिपोर्ट सीबीएसई को सौंपेगा।
  • इसके बाद बोर्ड तय करेगा कि उसे 10वीं में प्रमोट करना है या नहीं।

बचपन से ही दिखने लगी प्रतिभा

आरव के पिता दिलीप सिंह पटेल (फॉरेस्ट डिपार्टमेंट में कार्यरत) बताते हैं कि बेटे का जन्म 2014 में हुआ।

  • महज 6 महीने की उम्र में ही उसने ध्वनियों को पहचानना शुरू कर दिया था।
  • 1 साल की उम्र में किताबों में रुचि दिखाने लगा।
  • 3 साल का होते-होते उसे भारत के मुख्यमंत्री, गवर्नर और सामान्य ज्ञान की बातें कंठस्थ थीं।
  • बिना किसी कोचिंग के उसने 35 तक की टेबल याद कर ली।

स्कूलों में भी उसकी प्रतिभा को देखते हुए उसे लगातार कक्षाओं में प्रमोट किया गया।


स्कूल ने रोका, कोर्ट पहुंचा मामला

आरव ने जनवरी तक 9वीं की पढ़ाई कर ली थी। सभी इंटरनल एग्जाम भी दिए। लेकिन फाइनल एग्जाम से पहले ही स्कूल ने कहा कि उसकी उम्र सीबीएसई की गाइडलाइन (9वीं के लिए कम से कम 14 वर्ष) के मुताबिक नहीं है, इसलिए रजिस्ट्रेशन नहीं होगा।

स्कूल ने या तो पीछे की कक्षा में बैठने को कहा या फिर जन्मतिथि बदलने का दबाव डाला। परिवार ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। कई बार अपील करने के बाद भी जब राहत नहीं मिली तो मामला हाईकोर्ट पहुंचा।


खुद बनाया यूट्यूब चैनल, बच्चों को पढ़ा रहा गणित

आरव ने पढ़ाई में आए ब्रेक को समय की बर्बादी मानते हुए ‘नेक्स्ट स्किल एजुकेशन’ नाम से यूट्यूब चैनल शुरू किया।

  • इस चैनल पर वह 9वीं के बच्चों को मैथ्स पढ़ाता है।
  • उसके 80-90% मार्क्स आते हैं, लेकिन वह नंबरों को ज्यादा अहमियत नहीं देता।
  • उसकी मान्यता है कि रैंक और रिजल्ट से ज्यादा असली सीख मायने रखती है।

मां बोलीं- बचपन से खेल-खेल में सीखी हर चीज

आरव की मां संध्या पटेल कहती हैं कि बेटे को कभी खिलौनों का शौक नहीं रहा।

  • पहले जन्मदिन पर उसे किताब गिफ्ट की गई, जिसके बाद उसका पूरा ध्यान पढ़ाई पर चला गया।
  • खेल-खेल में ही वह सब कुछ सीखता गया।
  • पढ़ाई के साथ उसे क्रिकेट का भी शौक है।

साइकोलॉजिस्ट ने भी माना जीनियस

मनोचिकित्सक डॉ. दीपा सिंह ने बताया कि आरव का IQ (इंटेलिजेंस कोशंट) सामान्य बच्चों से कहीं अधिक है।
इसके साथ ही उसका EQ (इमोशनल कोशंट), CQ (क्रिएटिव कोशंट) और AQ (एडवर्सिटी कोशंट) भी औसत बच्चों से ज्यादा है।
डीएमआईटी टेस्ट में पाया गया कि उसके ब्रेन की कोशिकाएं तेज गति से काम करती हैं।


कोर्ट ने शिक्षा का अधिकार बताया मूल अधिकार

आरव के वकील हितेंद्र गिलानी ने कहा कि अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत राइट टू एजुकेशन हर बच्चे का मौलिक अधिकार है। सिर्फ उम्र की बाधा बनाकर किसी प्रतिभाशाली बच्चे को शिक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि पहले भी कई मिसालें हैं। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी ने 17 साल की उम्र में एलएलबी में दाखिला लिया था। इंदौर की तनिष्का सुजीत को भी विशेष अनुमति दी गई थी, जिसने 11 साल की उम्र में 10वीं और 12 साल की उम्र में 12वीं पास की थी।


समाज के लिए मिसाल

आरव की यह लड़ाई केवल उसकी नहीं, बल्कि उन सभी प्रतिभाशाली बच्चों के लिए रास्ता खोल सकती है जिन्हें सिस्टम उम्र की बाधाओं में बांध देता है। अदालत का यह आदेश शिक्षा व्यवस्था में नए दृष्टिकोण और लचीलापन लाने का संकेत देता है।

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