जबलपुर/सतना।
मृत पेंशनधारियों के खातों से लाखों रुपये निकालने के सनसनीखेज बैंक घोटाले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की विशेष अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। सतना स्थित इलाहाबाद बैंक की मुख्य शाखा में आउटसोर्स कर्मचारी रहे ब्रजेश तिवारी को चार साल के सश्रम कारावास और पांच हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई है। यह फैसला 28 फरवरी को सीबीआई की विशेष अदालत में जस्टिस रुपेश गुप्ता द्वारा सुनाया गया।
करीब एक दशक पुराने इस मामले में अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में तीन बैंक अधिकारियों—बादल पटेल, सचिन दुबे और ए.के. गुलाटी—को बरी कर दिया, लेकिन मुख्य आरोपी ब्रजेश तिवारी के खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोप सिद्ध पाए।

2011 से 2015 के बीच चला फर्जीवाड़ा
जांच में सामने आया कि वर्ष 2011 से 2015 के बीच आरोपी ने मृत पेंशनधारियों के 37 खातों से कुल 27 लाख 55 हजार रुपये अपने खाते में ट्रांसफर कर लिए। जिन लोगों की मृत्यु हो चुकी थी, उनके नाम पर पेंशन की राशि लगातार जारी रहती रही और आरोपी तकनीकी खामी का फायदा उठाकर रकम हड़पता रहा।
सीबीआई को 2017 में एक गुप्त शिकायत मिली थी कि सतना की बैंक शाखा में मृत व्यक्तियों के नाम पर भी पेंशन निकाली जा रही है। शिकायत को गंभीरता से लेते हुए जांच शुरू की गई। दस्तावेजों की पड़ताल में चौंकाने वाला खुलासा हुआ—जिन पेंशनधारियों की मृत्यु का रिकॉर्ड हेड ऑफिस में दर्ज था, उनकी पेंशन राशि बंद होने के बजाय किसी अन्य खाते में स्थानांतरित हो रही थी।
ट्रिगर फीड सिस्टम का दुरुपयोग
मामले की तह तक पहुंचने पर पता चला कि बैंक में ‘ट्रिगर फीड’ नामक तकनीकी प्रक्रिया के जरिए पेंशन राशि ट्रांसफर की जाती थी। इस सिस्टम में केवल खाता नंबर दिखाई देता था, खाताधारक का नाम नहीं। आरोपी ब्रजेश तिवारी के पास पेंशन से जुड़े डाटा और पासवर्ड की पहुंच थी।
जैसे ही किसी पेंशनधारी की मृत्यु की सूचना हेड ऑफिस से जोनल ऑफिस को भेजी जाती और खाता बंद करने की प्रक्रिया शुरू होती, आरोपी उस खाते का नंबर बदलकर अपने खाते का नंबर दर्ज कर देता। नतीजतन, बंद होने से पहले एक माह की पेंशन राशि उसके निजी खाते में चली जाती।
सीबीआई अधिवक्ता अंकित गोयल के अनुसार, आरोपी ने 37 अलग-अलग महीनों में 37 बार यह प्रक्रिया दोहराई। हर बार राशि 30 हजार से लेकर 1 लाख रुपये तक थी।
2005 में लगी नौकरी, 2011 से शुरू किया खेल
ब्रजेश तिवारी को वर्ष 2005 में आउटसोर्स कर्मचारी के रूप में नियुक्त किया गया था। ग्रेजुएशन तक पढ़े आरोपी ने बैंक के कई प्रबंधकों के साथ काम किया और पेंशन संबंधित कार्यों की जिम्मेदारी संभाली। इसी दौरान उसे मृत खाताधारकों के डाटा तक पहुंच मिली।
2011 से उसने योजनाबद्ध तरीके से फर्जीवाड़ा शुरू किया। बैंक की व्यस्तता और सिस्टम की तकनीकी खामियों का लाभ उठाते हुए वह महीनों तक रकम निकालता रहा, लेकिन किसी को भनक नहीं लगी।
2019 में चार्जशीट, 2026 में फैसला
सीबीआई ने विस्तृत जांच के बाद 2019 में अदालत में चार्जशीट पेश की। आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी), 468 (जालसाजी), 471 (फर्जी दस्तावेज का उपयोग) और 477(ए) (लेखा में हेराफेरी) के तहत मामला दर्ज किया गया।
लंबी सुनवाई और साक्ष्यों के परीक्षण के बाद फरवरी 2026 में अदालत ने फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि आरोपी ने बैंक अधिकारियों को गुमराह करते हुए तकनीकी प्रक्रिया का दुरुपयोग किया और मृत पेंशनधारियों की राशि हड़पी। हालांकि तीन अधिकारियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत न मिलने के कारण उन्हें बरी कर दिया गया।
बैंकिंग सिस्टम पर उठे सवाल
इस मामले ने बैंकिंग प्रणाली की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि मृत खाताधारकों की पेंशन समय पर बंद की जाती और डाटा की नियमित जांच होती, तो यह घोटाला लंबे समय तक नहीं चल पाता।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल सिस्टम में पारदर्शिता के साथ-साथ मजबूत ऑडिट तंत्र भी जरूरी है। पासवर्ड और संवेदनशील डाटा की सीमित पहुंच तथा नियमित मॉनिटरिंग से ऐसे मामलों पर रोक लगाई जा सकती है।
पीड़ितों के परिजनों को न्याय की उम्मीद
हालांकि इस घोटाले में सीधे तौर पर मृत पेंशनधारियों के परिजन प्रभावित हुए, लेकिन जांच के बाद बैंक ने राशि की वसूली और खातों के मिलान की प्रक्रिया शुरू की थी। अदालत के फैसले से यह संदेश गया है कि वित्तीय अपराधों में लिप्त व्यक्तियों को सजा से बचना आसान नहीं है।
चार साल की सजा भले ही बड़ी राशि के मुकाबले कम प्रतीत हो, लेकिन यह निर्णय बैंकिंग प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में अहम माना जा रहा है। सीबीआई का कहना है कि ऐसे मामलों में आगे भी सख्त कार्रवाई जारी रहेगी, ताकि आम जनता का भरोसा वित्तीय संस्थानों पर कायम रहे।