एमपी में 10 लाख दिव्यांगों के लिए पहली बार बनेगी पॉलिसी, 180 दिन में तैयार होगा ड्राफ्ट !

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भोपाल। मध्यप्रदेश सरकार प्रदेश के लगभग 10 लाख दिव्यांगजनों के लिए पहली बार एक व्यापक और समग्र नीति बनाने जा रही है। मुख्यमंत्री Mohan Yadav के निर्देश पर यह पहल शुरू की गई है, जिसका उद्देश्य दिव्यांगजनों से जुड़ी सभी योजनाओं और सेवाओं को एक मंच पर लाकर उन्हें अधिक प्रभावी बनाना है।

इस नई नीति का मसौदा 180 दिनों यानी लगभग 6 माह में तैयार किया जाएगा। इसके बाद इसे कैबिनेट की मंजूरी के लिए प्रस्तुत किया जाएगा और वर्ष 2026 में ही लागू करने का लक्ष्य रखा गया है। इस नीति के लागू होने के बाद प्रदेश के विभिन्न विभाग एक समन्वित ढंग से दिव्यांगजनों के कल्याण के लिए कार्य कर सकेंगे।

वर्तमान में मध्यप्रदेश में सामाजिक न्याय, महिला एवं बाल विकास, एमएसएमई, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे कई विभाग अलग-अलग योजनाओं के माध्यम से दिव्यांगजनों को लाभ प्रदान कर रहे हैं। लेकिन किसी एकीकृत नीति के अभाव में इन योजनाओं में समन्वय की कमी बनी रहती है। इसी कारण सरकार ने निर्णय लिया है कि एक ऐसी नीति बनाई जाए जो सभी विभागों के लिए समान रूप से लागू हो और दिव्यांगजनों के समग्र विकास को सुनिश्चित कर सके।

दिव्यांगजन विभाग के आयुक्त Dr Ajay Khemariya को इस नीति को तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। उन्होंने बताया कि यह प्रदेश के इतिहास में पहली बार होगा जब दिव्यांगजनों के लिए एक समग्र नीति बनाई जा रही है। उन्होंने कहा कि जिस तरह राज्य में बाल नीति और महिला नीति लागू है, उसी तरह दिव्यांगजन नीति भी अत्यंत आवश्यक है।

इस नीति को तैयार करने के लिए सरकार व्यापक स्तर पर परामर्श प्रक्रिया अपनाएगी। इसमें स्टेकहोल्डर्स, विषय विशेषज्ञों, सामाजिक संगठनों, शिक्षाविदों और स्वयं दिव्यांगजनों से सुझाव लिए जाएंगे। इसके अलावा ग्रामीण, शहरी और आदिवासी क्षेत्रों में जाकर वास्तविक स्थिति का आकलन किया जाएगा, ताकि नीति जमीनी हकीकत के अनुरूप बन सके।

विशेष रूप से अलीराजपुर, झाबुआ और बड़वानी जैसे आदिवासी क्षेत्रों में योजनाओं के क्रियान्वयन में आने वाली कठिनाइयों का अध्ययन किया जाएगा। वहां के दिव्यांगजनों से सीधे संवाद कर यह समझने की कोशिश की जाएगी कि उन्हें किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है और किस प्रकार की सहायता की आवश्यकता है।

नीति निर्माण के दौरान देश-विदेश के विशेषज्ञों से भी चर्चा की जाएगी। विश्वविद्यालयों में इस विषय पर किए गए शोध, अन्य राज्यों की नीतियों और अंतरराष्ट्रीय मॉडल का अध्ययन कर इसे अधिक प्रभावी और आधुनिक बनाने का प्रयास किया जाएगा। तेलंगाना और त्रिपुरा जैसे राज्यों की नीतियों का भी विश्लेषण किया जाएगा, ताकि बेहतर प्रथाओं को अपनाया जा सके।

वर्तमान में अलग-अलग विभागों के अपने-अपने नियम और मानक हैं, जिसके कारण दिव्यांगजनों को समान लाभ नहीं मिल पाता। नई नीति के माध्यम से इन सभी नियमों को एकीकृत कर एक समान ढांचा तैयार किया जाएगा। इससे न केवल योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन होगा, बल्कि लाभार्थियों को भी अधिक पारदर्शी और सरल प्रक्रिया का लाभ मिलेगा।

सरकार इस नीति के तहत दिव्यांगजनों के जीवन स्तर में सुधार लाने के लिए ठोस कदम उठाने की तैयारी कर रही है। इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पुनर्वास और सामाजिक सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को शामिल किया जाएगा।

नीति में यह प्रस्ताव भी शामिल किया जा सकता है कि 18 वर्ष से अधिक आयु के मानसिक रूप से दिव्यांग व्यक्तियों के लिए संभाग स्तर पर 100 बिस्तरों वाले विशेष आश्रय गृह स्थापित किए जाएं। इससे उन परिवारों को राहत मिलेगी, जो अपने दिव्यांग सदस्यों की देखभाल करने में असमर्थ हैं।

प्रदेश में वर्तमान में 2011 की जनगणना और यूनिक डिसेबिलिटी आईडी (UDID) के आधार पर करीब 10 लाख दिव्यांगजन दर्ज हैं। हालांकि आगामी जनगणना में यह संख्या और बढ़ने की संभावना है, क्योंकि पहले जहां केवल 7 प्रकार की दिव्यांगताओं को शामिल किया गया था, वहीं अब 21 प्रकार की दिव्यांगताओं को शामिल किया जाएगा।

इस नीति के निर्माण की प्रक्रिया फरवरी 2026 में शुरू हुई, जब आयुक्त डॉ. अजय खेमरिया ने मुख्यमंत्री को इस संबंध में पत्र लिखा। इसके बाद सामाजिक न्याय और दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग के मंत्री नारायण सिंह कुशवाह को भी प्रस्ताव भेजा गया। मुख्यमंत्री की स्वीकृति मिलने के बाद अब इस दिशा में औपचारिक रूप से काम शुरू कर दिया गया है।

सरकार ने निर्देश दिए हैं कि नीति तैयार करते समय शासकीय और अर्द्धशासकीय संस्थाओं, सिविल सोसायटी, खिलाड़ियों, सांस्कृतिक हस्तियों और दिव्यांगजनों के साथ काम करने वाले संगठनों से भी चर्चा की जाए। इससे नीति अधिक समावेशी और व्यावहारिक बन सकेगी।

इस पहल को सामाजिक समावेशन की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे न केवल दिव्यांगजनों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी, बल्कि उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने में भी मदद मिलेगी।

सरकार का लक्ष्य है कि इस नीति के माध्यम से दिव्यांगजनों को शिक्षा, रोजगार और आत्मनिर्भरता के अवसर प्रदान किए जाएं, ताकि वे सम्मानजनक जीवन जी सकें।

कुल मिलाकर, यह पहल मध्यप्रदेश में दिव्यांगजनों के कल्याण और सशक्तिकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित हो सकती है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि नीति का अंतिम स्वरूप कैसा होगा और इसके क्रियान्वयन से जमीनी स्तर पर कितना बदलाव देखने को मिलेगा।

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