जबलपुर में घोड़ों की मौत का सिलसिला: रहस्य, विवाद और न्यायालय तक पहुंचा मामला;

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जबलपुर में हैदराबाद से लाए गए घोड़ों की लगातार हो रही मौत ने प्रशासन, पशुपालन विभाग और पशु अधिकार कार्यकर्ताओं को गहरी चिंता में डाल दिया है। पिछले तीन महीने में 57 में से 19 घोड़ों की मौत हो चुकी है, जबकि बाकी बचे घोड़ों का जीवन भी खतरे में नजर आ रहा है।


मौत का बढ़ता आंकड़ा

5 मई को हैदराबाद से जबलपुर के रैपुरा गांव लाए गए थोरो, काठियावाड़ी और मारवाड़ी नस्ल के 57 घोड़े अब धीरे-धीरे काल के गाल में समा रहे हैं।

  • 7 मई से 13 मई के बीच 8 घोड़ों की मौत हुई।
  • इसके बाद एक-एक कर 5 घोड़े और मरे।
  • हाल ही में 6 और घोड़ों की जान चली गई।

अब तक मौत का आंकड़ा 19 तक पहुंच चुका है और बचे घोड़ों की संख्या घटकर सिर्फ 38 रह गई है।


कारण: पेट दर्द से लेकर पैरेलिसिस तक

नोडल अधिकारी डॉ. ज्योति तिवारी ने जानकारी दी कि घोड़ों की मौत के पीछे अलग-अलग कारण सामने आए हैं।

  • 2 घोड़े सेप्टीसीमिया से मरे।
  • 2 की मौत पैरेलिसिस से हुई।
  • 1 घोड़े को कोलिक (पेट दर्द) ने खत्म कर दिया।
  • 1 की जान रेस्पिरेटरी फेल्योर से गई।

चौंकाने वाली बात यह है कि ये मौतें तब हो रही हैं जब घोड़ों की देखरेख के लिए डॉक्टरों की टीम 24 घंटे मौके पर मौजूद है।


ग्लैंडर बीमारी की आशंका पर विराम

शुरुआत में मौतों के पीछे ग्लैंडर नामक घातक बीमारी का शक जताया गया था।

  • सभी घोड़ों के सैंपल हिसार (हरियाणा) की लैब भेजे गए।
  • रिपोर्ट नेगेटिव आई, यानी घोड़ों में यह बीमारी नहीं मिली।
  • एक घोड़े में जरूर ग्लैंडर जैसे लक्षण पाए गए थे।

इससे यह सवाल और गहरा हो गया कि आखिर मौत की असली वजह क्या है?


मालिक की बढ़ी चिंता, मांगी वापसी की अनुमति

लगातार हो रही मौतों के बाद घोड़ों के मालिक ने अब कुछ घोड़ों को हैदराबाद वापस भेजने की अनुमति मांगी है। हालांकि अभी इस पर अंतिम फैसला प्रशासन को लेना है।


हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला

23 मई को इस मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर की गई। अदालत ने मामले को गंभीरता से लिया है और अगली सुनवाई लंबित है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कोर्ट इन घोड़ों की जान बचाने और जिम्मेदारों पर कार्रवाई को लेकर क्या आदेश देती है।


विवाद: रेसिंग और ऑनलाइन सट्टे से जुड़ा कनेक्शन

इस घटना के पीछे सिर्फ बीमारी नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर का विवाद भी जुड़ा है।

  • पशु प्रेमी सिमरन ईशर (PETA) का आरोप है कि ये घोड़े हैदराबाद में चल रही हॉर्स पावर सुपर लीग (HPSL) से जुड़े हैं।
  • इस लीग को सुरेश पलादुगू चलाते थे और फिलीपींस में इन घोड़ों की रेस पर ऑनलाइन सट्टा खिलाया जा रहा था।
  • जब फिलीपींस सरकार को इसकी भनक लगी, तो उन्होंने भारत सरकार को सूचना दी।
  • तेलंगाना सरकार ने इस रेस को बंद करवा दिया।

एडवोकेट उमेश त्रिपाठी का कहना है कि इस घोटाले से बचने के लिए 154 घोड़ों को अलग-अलग राज्यों में भेज दिया गया। यहां तक कि कुछ घोड़ों को हैदराबाद में भूखा मारने की कोशिश भी की गई।


सचिन तिवारी का दावा: सिर्फ देखरेख के लिए आए थे

जबलपुर लाने वाले सचिन तिवारी का कहना है कि ये घोड़े उन्हें सिर्फ केयर-टेकिंग और देखरेख के लिए दिए गए थे।

  • हेथा नेट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने अपना काम हैदराबाद में बंद किया।
  • उसके बाद ये घोड़े 27 अप्रैल से 5 मई तक 11 ट्रिप में जबलपुर भेजे गए।
  • आखिरी 9 घोड़े 5 मई को पहुंचे।

सचिन का कहना है कि मौतें उनकी लापरवाही से नहीं हो रही हैं, बल्कि घोड़े पहले से कमजोर और बीमार हालत में भेजे गए थे।


बड़ा सवाल: जिम्मेदार कौन?

लगातार हो रही मौतों ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं—

  1. अगर घोड़े बीमार थे, तो इन्हें जबलपुर क्यों भेजा गया?
  2. क्या यह रेसिंग और सट्टेबाजी से जुड़े अंतरराष्ट्रीय रैकेट का हिस्सा है?
  3. डॉक्टरों की चौबीसों घंटे मौजूदगी के बावजूद मौतें क्यों नहीं थम रहीं?
  4. क्या प्रशासन और पशुपालन विभाग ने समय रहते सही कदम उठाए?

निष्कर्ष

जबलपुर में हो रही इन घोड़ों की रहस्यमयी मौतें सिर्फ पशु चिकित्सा या देखरेख की समस्या नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, सट्टेबाजी और संगठित अपराध के बड़े जाल की ओर इशारा करती हैं। अब निगाहें हाईकोर्ट के फैसले और प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं, जिससे यह तय होगा कि बचे हुए 38 घोड़ों को बचाया जा सकेगा या वे भी मौत के इस सिलसिले का हिस्सा बन जाएंगे।

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