बीना। प्रसिद्ध कथा व्यास Jaya Kishori ने बीना के खुरई रोड पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन श्रद्धालुओं को जीवन से जुड़े कई महत्वपूर्ण संदेश दिए। कथा के समापन अवसर पर उन्होंने सच्ची मित्रता, बच्चों की आत्मनिर्भरता, धर्म की सही समझ और दिखावे से दूर रहने जैसे विषयों पर विस्तार से अपने विचार रखे। कथा में हजारों की संख्या में श्रद्धालु, विशेष रूप से महिलाएं उपस्थित रहीं और भक्ति भजनों पर झूमते हुए नजर आए।
पूरे आयोजन स्थल पर आध्यात्मिक वातावरण बना रहा। कथा के अंतिम दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। मंच से कथा का वाचन करते हुए जया किशोरी ने भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता का उदाहरण देकर बताया कि जीवन में सच्चा मित्र सबसे बड़ी पूंजी होता है।
“सच्चा मित्र सुख-दुख में साथ खड़ा रहता है”
जया किशोरी ने कहा कि आज के समय में रिश्तों में स्वार्थ बढ़ता जा रहा है, लेकिन सच्ची मित्रता वह होती है जो हर परिस्थिति में साथ निभाए। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता केवल धार्मिक कथा नहीं, बल्कि जीवन जीने की सबसे बड़ी प्रेरणा है।

उन्होंने कहा कि सुदामा निर्धन थे, लेकिन श्रीकृष्ण ने कभी उनकी गरीबी नहीं देखी। उन्होंने अपने मित्र का सम्मान किया और बिना मांगे उसकी सहायता की। यही सच्ची मित्रता की पहचान है। उन्होंने कहा कि जीवन में ऐसे मित्र बहुत कम मिलते हैं जो आपके अच्छे समय में ही नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी आपके साथ मजबूती से खड़े रहें।
जया किशोरी ने युवाओं से कहा कि मित्रता केवल मनोरंजन और समय बिताने का साधन नहीं होनी चाहिए, बल्कि एक-दूसरे को सही मार्ग पर आगे बढ़ाने का माध्यम भी बननी चाहिए।
माता-पिता बच्चों को आत्मनिर्भर बनाएं
कथा के दौरान जया किशोरी ने माता-पिता को भी महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आज के समय में बच्चे शिक्षा तो प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन आत्मनिर्भरता की कमी तेजी से बढ़ रही है। कई युवा जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय लेने में असमर्थ महसूस करते हैं, क्योंकि उन्हें बचपन से हर छोटी-बड़ी सुविधा आसानी से उपलब्ध करा दी जाती है।
उन्होंने कहा कि माता-पिता का कर्तव्य केवल बच्चों को अच्छी शिक्षा देना ही नहीं, बल्कि उन्हें जीवन की चुनौतियों का सामना करने योग्य बनाना भी है। बच्चों को जिम्मेदारी, आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता सिखाना बेहद जरूरी है।
उन्होंने कहा कि यदि बच्चे आत्मनिर्भर होंगे, तभी वे जीवन में सफल और मजबूत बन पाएंगे। हर कठिनाई में माता-पिता का सहारा जरूरी है, लेकिन बच्चों को इतना सक्षम भी बनाना चाहिए कि वे स्वयं अपने फैसले ले सकें और परिस्थितियों का सामना कर सकें।
“केवल किताबी ज्ञान पर्याप्त नहीं”
जया किशोरी ने कहा कि आधुनिक शिक्षा जरूरी है, लेकिन केवल किताबी ज्ञान जीवन को सफल नहीं बना सकता। उन्होंने कहा कि जीवन के वास्तविक अनुभव, संस्कार और व्यवहारिक समझ भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
उन्होंने कहा कि आज कई युवा पढ़ाई में अच्छे होते हुए भी मानसिक रूप से कमजोर महसूस करते हैं, क्योंकि उन्हें व्यवहारिक जीवन की चुनौतियों से निपटने की तैयारी नहीं मिलती। ऐसे में परिवार और समाज की जिम्मेदारी है कि युवाओं को केवल अंक और डिग्री तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें मानसिक रूप से भी मजबूत बनाएं।
धर्म को समझने के लिए शास्त्र पढ़ें
कथा के दौरान जया किशोरी ने टीवी सीरियलों में दिखाई जाने वाली धार्मिक कहानियों पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि टीवी पर दिखाए जाने वाले कई दृश्य काल्पनिक होते हैं और उन्हें पूरी तरह वास्तविक धर्म नहीं माना जा सकता।
उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि धर्म को समझने के लिए शास्त्रों का अध्ययन करें। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म का वास्तविक ज्ञान वेद, पुराण, श्रीमद्भागवत और अन्य धार्मिक ग्रंथों में निहित है। यदि लोग स्वयं शास्त्रों को पढ़ेंगे और समझेंगे, तो धर्म के प्रति सही दृष्टिकोण विकसित होगा।

उन्होंने कहा कि कई बार मनोरंजन के उद्देश्य से धार्मिक कथाओं को बदलकर प्रस्तुत किया जाता है, जिससे लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। इसलिए धर्म को जानने और समझने के लिए मूल ग्रंथों का अध्ययन आवश्यक है।
सोशल मीडिया के दिखावे से दूर रहने की सलाह
जया किशोरी ने आज के समय में बढ़ते सोशल मीडिया दिखावे पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अब लोग कोई भी अच्छा कार्य करते हैं, तो सबसे पहले उसे सोशल मीडिया पर दिखाने की कोशिश करते हैं। धीरे-धीरे सेवा और भक्ति भी प्रदर्शन का माध्यम बनती जा रही है।
उन्होंने कहा कि ईश्वर को बाहरी दिखावे से कोई मतलब नहीं होता। भगवान केवल व्यक्ति के सच्चे और निर्मल भाव को देखते हैं। यदि किसी के मन में अहंकार या दिखावा है, तो उसका पुण्य कम हो जाता है।
उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि सेवा, दान और भक्ति को प्रदर्शन का विषय न बनाएं। यदि किसी जरूरतमंद की मदद करें, तो उसे प्रचार का माध्यम बनाने के बजाय निस्वार्थ भाव से करें।
कथा में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन आयोजन स्थल पर भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। विशेष रूप से महिलाओं की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। कथा और भजनों के दौरान श्रद्धालु भक्ति में डूबे नजर आए। कई महिलाएं भजनों पर झूमती और नृत्य करती दिखाई दीं।
पूरे आयोजन स्थल को आकर्षक ढंग से सजाया गया था। कथा के दौरान भक्तों ने भगवान श्रीकृष्ण के जयकारों के साथ आध्यात्मिक वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
युवाओं को संस्कारों से जोड़ने की जरूरत
जया किशोरी ने कहा कि वर्तमान समय में युवाओं को संस्कारों और भारतीय संस्कृति से जोड़ना बेहद आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आधुनिकता अच्छी बात है, लेकिन यदि व्यक्ति अपने संस्कार और संस्कृति को भूल जाए, तो समाज कमजोर हो जाता है।
उन्होंने कहा कि परिवारों में धार्मिक और नैतिक शिक्षा का वातावरण बनाना चाहिए। बच्चों को बचपन से ही सत्य, सेवा, सम्मान और संवेदनशीलता जैसे संस्कार सिखाने होंगे।
जीवन में सादगी और संवेदनशीलता जरूरी
अपने संदेश के अंत में जया किशोरी ने कहा कि जीवन में सादगी और संवेदनशीलता सबसे बड़ी ताकत है। व्यक्ति जितना सरल और विनम्र होगा, उतना ही मानसिक रूप से शांत रहेगा।
उन्होंने कहा कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग बाहरी चमक-दमक के पीछे भाग रहे हैं, लेकिन वास्तविक सुख सादगी, संतोष और अच्छे संबंधों में छिपा होता है। यदि व्यक्ति अपने जीवन में अच्छे संस्कार, सच्ची मित्रता और सेवा भाव को अपनाए, तो उसका जीवन सफल और सुखमय बन सकता है।