मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के संदेहास्पद जाति प्रमाण पत्रों की जांच को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। राज्य स्तरीय छानबीन समितियों के रिकॉर्ड में ऐसे 151 मामले सामने आए हैं, जिनमें वर्षों बाद भी संबंधित व्यक्तियों की वास्तविक जाति तय नहीं हो सकी है। इन मामलों में कई रसूखदार अधिकारी, न्यायिक पदों पर बैठे लोग, इंजीनियर और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी शामिल हैं।
चौंकाने वाली बात यह है कि कुछ मामलों में संबंधित व्यक्ति की मृत्यु हो जाने के बाद भी जांच फाइलों में लंबित दिखाई जा रही है। वहीं, कई मामले 20 से 23 वर्षों से अलग-अलग विभागों की रिपोर्ट और न्यायालयीन प्रक्रिया के कारण अटके हुए हैं।

मृत व्यक्ति का मामला भी अब तक लंबित
लंबित प्रकरणों के रजिस्टर में क्रमांक 16 पर दर्ज नाम डॉ. विशाल खाम्बरा का है। रिकॉर्ड के अनुसार उनकी 21 अगस्त 2023 को मृत्यु हो चुकी है। मृत्यु प्रमाण पत्र दस्तावेजों में शामिल होने के बावजूद छानबीन समिति ने अब तक इस मामले को लंबित श्रेणी से हटाया नहीं है।
इससे जांच प्रणाली और रिकॉर्ड प्रबंधन की गंभीर लापरवाही उजागर हो रही है।
23 साल से लंबित है शिक्षिका की जाति जांच
सूची में सबसे पुराना मामला शिक्षिका आशा का बताया जा रहा है। उनके खिलाफ 4 मई 2001 को शिकायत दर्ज हुई थी। लेकिन 23 साल बीत जाने के बाद भी उनकी जाति की जांच पूरी नहीं हो सकी।
कारण बताया गया है कि जबलपुर के सहायक आयुक्त कार्यालय से आवश्यक जानकारी प्राप्त नहीं हुई है।
इसी तरह रायसेन के स्वास्थ्य कार्यकर्ता राजेंद्र कुमार ओड़ का मामला 19 जनवरी 2005 से लंबित है। इसमें पुलिस अधीक्षक की रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है।
केस-1: 14 साल बाद आई विजिलेंस रिपोर्ट, फिर भी फैसला नहीं
लोक निर्माण विभाग में विशेष भर्ती अभियान के तहत सहायक यंत्री बने योगेंद्र कुमार के खिलाफ वर्ष 2008 में शिकायत दर्ज हुई थी। उन पर अनुसूचित जाति आरक्षण का गलत लाभ लेने का आरोप लगा।
करीब 14 साल बाद वर्ष 2022 में विजिलेंस रिपोर्ट सामने आई। रिपोर्ट में कहा गया कि:
- एससी-एसटी आरक्षण का लाभ उसी राज्य में मान्य होता है, जहां व्यक्ति या उसके पूर्वज 1950 से पहले से निवासरत हों।
- माइग्रेशन की स्थिति में दूसरे राज्य की सेवाओं में आरक्षण मान्य नहीं होता।
जांच में पाया गया कि योगेंद्र कुमार के पिता किशन लाल जाटव मूल रूप से आगरा जिले के नरहौली गांव के निवासी हैं और 1965 में ग्वालियर आए थे। इसके बावजूद मामला अब तक लंबित बना हुआ है।
केस-2: प्रमाण पत्र निरस्त, फिर भी अधिकारी पद पर कायम
वाणिज्यिक कर विभाग का मामला भी बेहद चौंकाने वाला है। जय कुमार वर्मा ने वर्ष 2005 में ‘गौड़’ जनजाति का प्रमाण पत्र लगाकर एसटी कोटे से नौकरी हासिल की थी। बाद में वे पदोन्नत होकर सहायक वाणिज्यिक कर अधिकारी बन गए।
उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने 2 नवंबर 2019 को उनका जाति प्रमाण पत्र निरस्त कर दिया। जांच में सामने आया कि वे ‘गौड़’ जनजाति के नहीं बल्कि ‘राज मिस्त्री’ जाति से संबंधित हैं, जो अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में आती है।
इसके बावजूद वे आज भी इंदौर में पदस्थ बताए जा रहे हैं।
केस-3: रिटायर इंजीनियर की जाति पर सवाल
लोक निर्माण विभाग के रिटायर्ड ईएनसी नरेंद्र कुमार के खिलाफ भी वर्ष 2024 में शिकायत दर्ज हुई है। रजिस्टर में दर्ज जानकारी के अनुसार उनकी जाति प्रमाण पत्र की जांच के लिए ग्वालियर पुलिस अधीक्षक से रिपोर्ट मांगी गई है।
जज और अफसरों की जाति पर भी संदेह
लंबित मामलों की सूची में कई बड़े नाम शामिल हैं, जिनकी जाति प्रमाण पत्र की सत्यता पर सवाल उठाए गए हैं। इनमें:
- मंदसौर के द्वितीय अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश राजकुमार
- वल्लभ भवन भोपाल में पदस्थ अवर सचिव राधेश्याम बघेल
- प्रभारी मुख्य अभियंता रामदयाल अहिरवार
- लोक निर्माण विभाग के अधीक्षण यंत्री जिलेसिंह
- मुरैना नगर निगम की पूर्व महापौर शारदा सोलंकी
जैसे नाम शामिल बताए जा रहे हैं।
हाईकोर्ट में फंसे हैं कई मामले
कई मामलों में कानूनी अड़चनें भी जांच प्रक्रिया को प्रभावित कर रही हैं। रजिस्टर के अनुसार क्रमांक 22 से 35 तक सहित कई मामले मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में लंबित याचिकाओं के कारण रुके हुए हैं।
हाईकोर्ट ने कई मामलों में अंतिम फैसला आने तक यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए हैं। इससे जांच समितियां अंतिम निर्णय नहीं ले पा रही हैं।
आरक्षण व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
इन मामलों के सामने आने के बाद आरक्षण व्यवस्था की पारदर्शिता और सत्यापन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सामाजिक संगठनों का कहना है कि:
- फर्जी जाति प्रमाण पत्रों के जरिए असली पात्रों का हक छीना जा रहा है।
- जांच प्रक्रिया बेहद धीमी और लापरवाह है।
- वर्षों तक मामले लंबित रहने से दोषियों को लाभ मिलता रहता है।
मध्य प्रदेश में फर्जी और संदेहास्पद जाति प्रमाण पत्रों से जुड़े 151 मामलों का वर्षों तक लंबित रहना प्रशासनिक व्यवस्था की गंभीर कमजोरी को उजागर करता है। कई मामलों में जांच पूरी होने के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई, जबकि कुछ मामलों में मृत व्यक्तियों की फाइलें भी अब तक बंद नहीं की गईं। अब जरूरत है कि सरकार और जांच एजेंसियां समयबद्ध कार्रवाई कर वास्तविक पात्रों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करें।