सागर में 25 अप्रैल 2026 को आयोजित छठवें राज्य वित्त आयोग की बैठक ने स्थानीय शासन व्यवस्था के आर्थिक भविष्य को लेकर एक नई दिशा प्रदान की। जयभान सिंह पवैया की अध्यक्षता में हुई इस बैठक का मुख्य उद्देश्य नगरीय निकायों और त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं को वित्तीय रूप से सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना था। बैठक में विभिन्न जनप्रतिनिधियों ने भाग लेकर जमीनी स्तर की समस्याओं और संभावनाओं पर खुलकर चर्चा की।
राज्य वित्त आयोग, जो कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243-I और 243-Y के तहत गठित एक संवैधानिक निकाय है, का कार्य स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति का आकलन करना और उनके लिए संसाधनों के बेहतर वितरण की सिफारिश करना है। हर पांच वर्ष में गठित होने वाला यह आयोग पंचायतों और नगरपालिकाओं के लिए करों के बंटवारे, अनुदान सहायता और वित्तीय सुधारों के सुझाव देता है।
बैठक में अध्यक्ष पवैया ने स्पष्ट किया कि अब समय आ गया है जब स्थानीय निकायों को केवल सरकारी अनुदानों पर निर्भर रहने की प्रवृत्ति से बाहर निकलना होगा। उन्होंने कहा कि “ग्रांट आधारित व्यवस्था से आगे बढ़कर रेवेन्यू जनरेशन की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।” उनका मानना था कि यदि पंचायतें और नगर निकाय अपने स्वयं के आय स्रोत विकसित करें, तो वे अधिक स्वतंत्र और प्रभावी ढंग से विकास कार्यों को अंजाम दे सकेंगे।

इस संदर्भ में उन्होंने 73वां संवैधानिक संशोधन और 74वां संवैधानिक संशोधन का उल्लेख करते हुए कहा कि इनका मूल उद्देश्य सत्ता और वित्त का विकेंद्रीकरण था। इन संशोधनों के माध्यम से स्थानीय निकायों को अधिक अधिकार और जिम्मेदारियां दी गई थीं, ताकि वे अपने क्षेत्र के विकास की योजना स्वयं बना सकें और उसे लागू कर सकें।
बैठक का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि इसमें सांसद, विधायक, महापौर और जिला पंचायत अध्यक्ष जैसे निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से सीधे संवाद किया गया। इस संवाद के माध्यम से आयोग को जमीनी स्तर पर मौजूद वास्तविक समस्याओं और चुनौतियों की जानकारी मिली। जनप्रतिनिधियों ने राजस्व संग्रहण की कठिनाइयों, विकास कार्यों के लिए अपर्याप्त संसाधनों और बढ़ते व्यय के दबाव जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।
लता वानखेड़े ने ग्रामीण क्षेत्रों के वित्तीय सुदृढ़ीकरण की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि गांवों में बुनियादी सुविधाओं के लिए पर्याप्त संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। वहीं, शैलेंद्र जैन और संगीता तिवारी ने नगरीय निकायों के सामने आने वाली चुनौतियों को रेखांकित किया।
शैलेंद्र जैन ने विशेष रूप से अमृत योजना के क्रियान्वयन के दौरान सामने आई समस्याओं का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि पाइपलाइन बिछाने के कारण कई सड़कों को नुकसान पहुंचा है, जिनका समय पर पुनर्निर्माण आवश्यक है। इसके अलावा, उन्होंने जल आपूर्ति व्यवस्था में सुधार, नगर निगम के राजस्व संग्रहण को बढ़ाने के लिए सर्वेक्षण के माध्यम से छूटे हुए घरों को जोड़ने और संपत्ति कर भुगतान को प्रोत्साहित करने के उपायों पर भी सुझाव दिए।
प्रदीप लारिया ने तेजी से हो रहे शहरीकरण और नई कॉलोनियों के निर्माण की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि कॉलोनाइजरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के माध्यम से पंचायतों की आय बढ़ाई जा सकती है। उन्होंने सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देने की बात भी कही, जिससे बिजली के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल की जा सके।
अन्य जनप्रतिनिधियों जैसे बृज बिहारी पटेरिया, वीरेंद्र सिंह लोधी और हीरा सिंह राजपूत ने पंचायती राज संस्थाओं को सीधे फंड हस्तांतरण और आवंटन प्रक्रिया को सरल बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका मानना था कि जटिल प्रक्रियाओं के कारण विकास कार्यों में देरी होती है, जिसे दूर करना आवश्यक है।

बैठक में पंद्रहवां वित्त आयोग की अनुशंसाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी चर्चा की गई। आयोग ने सुझाव दिया कि प्राप्त धनराशि का शत-प्रतिशत और गुणवत्तापूर्ण उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए। साथ ही, यह भी कहा गया कि राजस्व का एक बड़ा हिस्सा ऐसी परिसंपत्तियों के निर्माण में लगाया जाए, जो भविष्य में आय का स्रोत बन सकें, जैसे कि बाजार, पार्किंग स्थल, सामुदायिक भवन आदि।
तकनीक के उपयोग को भी राजस्व संग्रहण में सुधार का एक महत्वपूर्ण साधन बताया गया। संपत्ति कर और अन्य करों की वसूली में डिजिटल माध्यमों का उपयोग कर पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाई जा सकती है। इससे न केवल भ्रष्टाचार में कमी आएगी, बल्कि नागरिकों के लिए कर भुगतान की प्रक्रिया भी सरल हो जाएगी।
अध्यक्ष जयभान सिंह पवैया ने बैठक के अंत में आश्वासन दिया कि सभी जनप्रतिनिधियों द्वारा दिए गए सुझावों को गंभीरता से लिया जाएगा और उन्हें आयोग की आगामी रिपोर्ट में शामिल किया जाएगा। उन्होंने कहा कि जब तक स्थानीय निकाय वित्तीय रूप से मजबूत और स्वायत्त नहीं बनेंगे, तब तक विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना संभव नहीं होगा।

यह बैठक इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में स्थानीय शासन व्यवस्था में वित्तीय सुधारों को प्राथमिकता दी जाएगी। यदि आयोग की सिफारिशों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो इससे न केवल स्थानीय निकायों की कार्यक्षमता बढ़ेगी, बल्कि समग्र विकास की गति भी तेज होगी।
अंततः, वित्तीय स्वावलंबन ही वह आधार है, जिस पर एक सशक्त और आत्मनिर्भर स्थानीय शासन प्रणाली का निर्माण संभव है। सागर में आयोजित यह बैठक इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।