मध्यप्रदेश। सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देशों के बाद मध्यप्रदेश में स्ट्रीट डॉग्स (आवारा कुत्ते) की समस्या पर ध्यान फिर तेज़ी से गया है। नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) के राष्ट्रीय रैबीज नियंत्रण कार्यक्रम के आँकड़ों के अनुसार प्रदेश में साल 2022 में स्ट्रीट डॉग्स की संख्या 10,09,000 आंकी गई थी। अकेले भोपाल, इंदौर, उज्जैन, ग्वालियर और जबलपुर में इनकी संख्या 6 लाख से अधिक बतायी जा रही है — और यहीं पर कुत्तों के हमले भी सबसे ज़्यादा दर्ज हुए हैं।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश — सख्त निर्देश और कारण
सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में राजस्थान हाईकोर्ट के निर्णय को पूरे देश पर लागू करते हुए कहा कि:
- सभी स्टेट और नेशनल हाईवे से आवारा पशु हटाए जाएं;
- अस्पतालों, स्कूलों और कॉलेज कैंपस में आवारा कुत्तों से सुरक्षा के लिए बाड़ लगाएं;
- आवारा पशुओं के प्रबंधन व रैबीज़ नियंत्रण के लिए समन्वित नीति और रणनीति लागू हो।
इस फैसले के बाद नेशनल व राज्य स्तर पर कार्यक्रमों और आंकड़ों की पड़ताल तेज हुई — और मध्यप्रदेश का डेटा चिंता बढ़ाने वाला बताया गया।
कितने काटे गए लोगों को? — दिल दहला देने वाले आँकड़े
NHM के आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 में मात्र भोपाल में 19,285 लोग डॉग-बाइट के शिकार हुए। वहीं इस साल (जनवरी-जून) में प्रदेशभर में 10,795 डॉग-बाइट के मामले दर्ज किए गए। कुछ शहरों के हाल:
- इंदौर: 30,304 केस (कुल संख्या/रिपोर्ट संदर्भ में)
- ग्वालियर: 11,902
- जबलपुर: 13,619
- उज्जैन: 10,296
(नोट: ऊपर के आंकड़े रिपोर्टिंग के संदर्भ/समयावधि पर निर्भर हैं और NHM के राष्ट्रीय रैबीज़ नियंत्रण कार्यक्रम की रिपोर्ट पर आधारित हैं।)
वास्तविकता मैदान पर — अस्पताल, स्कूल-कैंपस में भी कुत्ते
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के पालन के बाद भोपाल के कुछ इलाकों का सर्वे हुआ—जेपी जिला अस्पताल परिसर में 20 से ज़्यादा आवारा कुत्ते देखे गए। यह स्थिति मरीजों, उनके साथियों और स्वास्थ्यकर्मियों के लिए गंभीर जोखिम है।
भोपाल नगर निगम तीन ABC सेंटर (कजलीखेड़ा, आदमपुर, अरवलिया) चला रहा है और प्रतिवर्ष लगभग 22,000 नसबंदी (sterilisation) की जाती है। प्रतिदिन औसतन 50 नसबंदी का काम बताया जा रहा है। लेकिन नसबंदी के बाद कई बार कुत्तों को उसी जगह छोड़ दिया जाता है जहाँ से पकड़ा गया था — जिससे स्थानीय जनसंख्या पर दबाव और समस्या बरकरार रहती है।
विशेषज्ञों की व्याख्या — क्यों बढ़ती है आक्रामकता?
भोपाल के पूर्व उप-संचालक पशु चिकित्सा डॉ. अजय रामटेके के अनुसार:
- ठंड व गर्मी में बेचैनी: ठंड के दिनों में ब्रीडिंग सीज़न शुरू होता है; मां की सुरक्षा-प्रवृत्ति बढ़ जाती है, बच्चे बचाने के लिए वे आक्रामक हो सकती हैं। गर्मी में शरीर का तापमान नियंत्रित करने की परेशानी भी तनाव बढ़ाती है।
- नसबंदी का अभाव: नसबंदी न होने पर हार्मोन असंतुलन से आक्रामक प्रवृत्ति बढ़ती है।
- टीकाकरण की कमी: एंटी-रैबीज़ टीकाकरण समय पर न होने पर व्यवहार में बदलाव आता है।
- खाना-पानी की कमी: समय पर भोजन न मिलने से कुत्ते भूख व तनाव में हिंसक हो जाते हैं।
इन चार कारणों में नसबंदी का अभाव सबसे अहम माना जा रहा है — पर सरकारी आंकड़ों के अनुसार नसबंदी व डॉग-मैनेजमेंट की तादाद और जरूरत के बीच बड़ा अंतर है।
क्या किया जा रहा है और क्या किया जाना चाहिए? (सुझाव एवं चुनौतियाँ)
- नसबंदी-वैक्सीनेशन अभियान: नगर निगमों द्वारा बड़े पैमाने पर TNR (Trap-Neuter-Return) कार्यक्रम चल रहे हैं, पर वे इतनी गति पर नहीं हैं कि युवा आबादी पर नियंत्रण आ सके।
- रैबीज़ फ्री मिशन 2030: NHM के तहत छह शहरों को राष्ट्रीय रैबीज़ नियंत्रण कार्यक्रम में शामिल कर 2030 तक रैबीज़-फ्री लक्ष्य रखा गया है — पर रोडमैप व वित्त-संसाधन सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
- हाइजीन व कचरा प्रबंधन: कुत्तों का भोजन एवं आबादी कूड़ेखाने व खुले भोजन स्रोत से जुड़ा है — बेहतर ठोस अपशिष्ट प्रबंधन से समस्या घट सकती है।
- सार्वजनिक-नागरिक शिक्षा: लोग कुत्तों को खिलाने, झुंड बढ़ाने के अनजाने व्यवहारों से अवगत हों।
- सख्त लागू-नीतियाँ: सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार अस्पताल, स्कूल, हाईवे से आवारा पशु हटाने व सुरक्षित बाड़े लगाने का त्वरित अनुपालन आवश्यक।