मध्य प्रदेश के सागर जिले के ग्राम धामोनी, जो राजा सूरतशाह की ऐतिहासिक नगरी के नाम से विख्यात है, में आज जनजाति गौरव दिवस का भव्य एवं उत्साहपूर्ण आयोजन हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ आदिवासी नायकों—भगवान बिरसा मुंडा एवं अन्य जनजातीय महापुरुषों—के चित्रों पर माल्यार्पण और श्रद्धांजलि अर्पित कर किया गया। कार्यक्रम में जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता, वनवासी संगठन के पदाधिकारी व बड़ी संख्या में ग्रामीणजन उपस्थित रहे।

कार्यक्रम की अध्यक्षता वनवासी विकास परिषद के प्रांत उपाध्यक्ष श्री संजय सिंह भदौरिया ने की। मंच पर प्रांत सह संगठन मंत्री श्री तुलसी तिवारी, नारायण सिंह (कबीरपंथी), जिला अध्यक्ष श्री राजेंद्र सिंह धुर्वे, महानगर अध्यक्ष श्री भूपति सिंह मरकम सहित अनेक सामाजिक व राजनैतिक हस्तियाँ मौजूद रहीं। आयोजकों ने बताया कि यह आयोजन जनजातीय समुदाय की गौरव-परम्परा को संरक्षित करने और युवा पीढ़ी में आदिवासी संस्कृति के प्रति गर्व पैदा करने के उद्देश्य से आयोजित किया गया है।
डॉ. श्याम सिंह कुमरे का विचार
मध्य प्रदेश शासन के सेवानिवृत्त सचिव व वरिष्ठ प्रशासक डॉ. श्याम सिंह कुमरे ने संबोधन में कहा कि जनजातीय समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, परंपराएँ और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता ही भारतीय सभ्यता की मूल शक्ति हैं। उन्होंने कहा, “भगवान बिरसा मुंडा जैसे महापुरुषों के संघर्ष से हमें राष्ट्रभक्ति, साहस व सामाजिक समरसता का पाठ मिलता है। आदिवासी समुदाय का पारंपरिक ज्ञान—जैसे प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, सामुदायिक जीवन और नदी-वन-क्षेत्र के सतत उपयोग—आज के समय में भी प्रासंगिक और अनुकरणीय है।”

डॉ. कुमरे ने यह भी कहा कि सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक सशक्तिकरण और वनाधिकार जैसे क्षेत्रों में योजनाएँ चला रही है, जिससे जनजातीय क्षेत्रों में व्यापक विकास दिख रहा है। साथ ही उन्होंने स्थानीय प्रशासन और समुदायों से अपील की कि वे इन पहलों को प्रभावी ढंग से लागू कर विकास के फलों को जनजातीय परिवारों तक पहुँचाएँ।
सांस्कृतिक संरक्षण व संगठनात्मक प्रयास
अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के क्षेत्र संगठन मंत्री श्री सुभाष बडोले ने अपने वक्तव्य में जनजातीय समुदाय को भारतीय संस्कृति का अभिन्न और प्राचीनतम अंग बताया। उन्होंने कहा कि “जनजातीय समाज ने अपनी परंपराओं, रीति-रिवाजों और प्राकृतिक जीवनशैली को जिस प्रकार संरक्षित रखा है, वह पूरे समाज के लिए प्रेरणास्पद है।” श्री बडोले ने संगठन द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका के क्षेत्र में चल रही पहलों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन प्रयासों का उद्देश्य जनजातीय समुदाय को मुख्यधारा के विकास से जोड़ना और उनके पारंपरिक ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुँचाना है।

नारी शक्ति का सम्मान — सुश्री शशि ठाकुर
अखिल भारतीय वनवासी क्षेत्रीय महिला प्रमुख सुश्री शशि ठाकुर ने अपने संबोधन में जनजातीय महिलाओं के अदम्य साहस और नेतृत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने रानी दुर्गावती, वीरांगना रानीवती और अन्य आदिवासी महिला नायिकाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि ये वीरांगनाएँ मातृभूमि की रक्षा और समाज के कल्याण के प्रतीक रहीं। सुश्री ठाकुर ने कहा, “जनजातीय नारी शक्ति ने सदैव नेतृत्व, पराक्रम और सामाजिक समरसता का परिचय दिया है—हमें उनके योगदान को मान्यता देनी चाहिए और नई पीढ़ी को इन आदर्शों से प्रेरित करना चाहिए।”
सांस्कृतिक कार्यक्रम व स्थानीय भाव-भंगिमा
कार्यक्रम स्थल पर अतिथियों का पारंपरिक अंदाज में स्वागत किया गया; स्थानीय नेताओं और बच्चों ने पेड़ के पत्तों से बने मुकुट पहनाकर अभिनंदन किया, जो ग्रामीण संस्कृति और पर्यावरण के करीब रहने का प्रतीक था। मंचीय कार्यक्रम में कविता लारिया द्वारा वनवासी समाज पर आधारित गीत प्रस्तुति ने सभा को भावविभोर कर दिया। साथ ही पारंपरिक नृत्य, स्थानीय वाद्य-यंत्रों की थाप और लोकगीतों ने आयोजन को उत्सवमय बना दिया। आयोजकों ने बताया कि इन सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का उद्देश्य युवा पीढ़ी में अपनी सांस्कृतिक जड़ों के प्रति जागरूकता बढ़ाना और पारंपरिक कलाओं को संरक्षण प्रदान करना है।

अन्य उपस्थित गणमान्य एवं समापन
कार्यक्रम में ग्राम पंचायत पदाधिकारियों—श्री महेन्द्र गुप्ता, बलराम पाराशर, पंकज मुखारया, हेमंत दुबे, अजय पहारिया, मनीष नेमा, रामकेश तेकाम, मुन्ना लाल सलेमपुर सहित अनेक ग्रामीणजन उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन और व्यवस्थापन स्थानीय वनवासी विकास परिषद द्वारा किया गया। अंत में प्रांतीय पदाधिकारियों ने मिलकर समेकित प्रयासों के माध्यम से जनजातीय कल्याण के लिए आगे बढ़ने का संकल्प लिया और सभी उपस्थित जनों को धन्यवाद ज्ञापित किया।
कार्यक्रम का समापन पारंपरिक वादन-नृत्य और सामूहिक गीतों के साथ हुआ, जिसमें उपस्थित लोगों ने स्थानीय संस्कृति और पर्यावरण के संरक्षण के संकल्प को दोहराया। आयोजकों ने घोषणा की कि भविष्य में भी ऐसे सांस्कृतिक व जागरूकता कार्यक्रम निरंतर आयोजित किए जाएंगे ताकि जनजातीय विरासत को सुरक्षित रखते हुए उनके आर्थिक व सामाजिक उत्थान की गारंटी सुनिश्चित की जा सके।