डॉ. सर हरीसिंह गौर : ज्ञान, त्याग और राष्ट्रीय चेतना के महान प्रतीक !

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भारत के महान शिक्षाविद्, न्यायविद, समाजसुधारक, साहित्यकार, दानी, राष्ट्रनायक और मानवता के प्रेरक डॉ. सर हरीसिंह गौर (1870–1949) भारतीय इतिहास की उन विभूतियों में से हैं जिनका संपूर्ण जीवन केवल राष्ट्र और समाज के उत्थान के लिए समर्पित रहा। सागर की पुण्यभूमि पर जन्मे इस महापुरुष ने जिस प्रकार निर्धनता और सामाजिक विषमताओं के बीच ज्ञान और शिक्षा को जीवन का लक्ष्य बनाया, वह आज भी हर पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।


गरीब परिवार में जन्म, परंतु विशाल जीवन-दृष्टि

डॉ. गौर का जन्म 26 नवम्बर 1870 को सागर के शनीचरी टौरी मोहल्ले में एक गरीब परिवार में हुआ। पिता गंगाराम गौर आर्थिक तंगी के बावजूद उन्हें पढ़ाना चाहते थे। डॉ. गौर बचपन से ही अत्यंत बुद्धिमान और अध्ययनशील रहे।
उन्होंने—

  • सागर गवर्नमेंट हाई स्कूल से मिडिल परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की,
  • छात्रवृत्ति प्राप्त कर उच्च अध्ययन जारी रखा,
  • जबलपुर और नागपुर के हिसलप कॉलेज में पढ़ाई करते हुए इंटरमीडिएट में प्रांत में प्रथम स्थान प्राप्त किया।

दरिद्रता उनके मार्ग में कभी बाधा नहीं बनी। दृढ़ संकल्प और प्रतिभा के सहारे उन्होंने 1889 में स्कॉलरशिप पर इंग्लैंड जाकर विश्वस्तरीय शिक्षा प्राप्त की।


कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा — तर्क, विधि और दर्शन के महारथी

इंग्लैंड में उन्होंने—

  • 1892 में दर्शन व अर्थशास्त्र में ऑनर्स,
  • फिर एम.ए., एल.एल.एम. और 1908 में प्रतिष्ठित एल.एल.डी.
  • डी.लिट. की उच्च उपाधियां अर्जित कीं।

कैम्ब्रिज में वे भारतीय छात्रों के गौरव बन चुके थे। उनके अध्ययन के साथ-साथ साहित्य-सृजन ने उन्हें रॉयल सोसाइटी ऑफ लिटरेचर का स्वर्णपदक दिलाया।


विश्वस्तरीय विधिवेत्ता — भारतीय कानून साहित्य के शिल्पकार

भारत लौटकर डॉ. गौर ने वकालत में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उनकी प्रसिद्ध पुस्तकों में—

  • The Law of Transfer in British India (1902)
  • The Penal Law of British India (1909)
  • The Spirit of Buddhism
    जैसी कालजयी कृतियाँ शामिल हैं।

The Spirit of Buddhism की प्रस्तावना स्वयं गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखी थी। इस पुस्तक ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर को भी गहन रूप से प्रभावित किया। जापान में उन्हें बौद्ध दर्शन के विद्वान के रूप में सम्मानित किया गया।


शिक्षा के आकाश में ध्रुवतारा – दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति

1921 में जब दिल्ली विश्वविद्यालय की स्थापना हुई, तब प्रथम कुलपति के रूप में डॉ. हरीसिंह गौर को नियुक्त किया गया। यह उनके विद्वत्व, प्रशासनिक कुशलता और वैश्विक प्रतिष्ठा का प्रमाण था।
उनकी सेवाओं को देखते हुए 1925 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ‘सर’ की उपाधि प्रदान की।


सागर विश्वविद्यालय – विश्व में अपनी तरह का अद्वितीय विश्वविद्यालय

अपनी जन्मभूमि में उच्च शिक्षा के अभाव से वे व्यथित थे। अतः उन्होंने अपने जीवनभर की कमाई, लगभग 20 लाख रुपये और बाद में 2 करोड़ रुपये की निजी संपत्ति दान कर 18 जुलाई 1946 को डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय की स्थापना की।
यह विश्व का एकमात्र विश्वविद्यालय है जिसकी स्थापना किसी शिक्षाविद् ने अपनी निजी कमाई से की हो।

स्वतंत्र भारत और सागर विश्वविद्यालय का जन्म लगभग एक साथ हुआ, और डॉ. गौर 25 दिसम्बर 1949 तक इसके विकास हेतु समर्पित रहे। उनका सपना था कि सागर विश्वविद्यालय कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड की श्रेणी में खड़ा हो।


राष्ट्रीय और सामाजिक योगदान — संविधान निर्माण से समाज-सुधार तक

डॉ. गौर—

  • संविधान सभा के उपसभापति,
  • साइमन कमीशन के सदस्य,
  • नागपुर विश्वविद्यालय के दो बार कुलपति रहे।

वे स्त्री शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह, समानता, बंधुत्व और सामाजिक न्याय के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने स्त्रियों के संपत्ति अधिकारों पर कई बार आवाज उठाई।

1976 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया।


बहुआयामी व्यक्तित्व – साहित्यकार, विचारक और समाजसेवक

उन्होंने कई काव्य-संग्रह लिखे, विधि और दर्शन पर शोधकार्य किया तथा भारतीय शिक्षा व्यवस्था, संस्कृति और धर्म पर गहन लेखन किया।
वे कहते थे—
“राष्ट्र का धन न खजाने में है, न कारखानों में; बल्कि नागरिकों के ज्ञान और चरित्र में निहित है।”


25 दिसम्बर 1949 – युगपुरुष का महाप्रयाण, परंतु प्रेरणा अमर

डॉ. हरीसिंह गौर आज भले शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, परंतु—

  • उनकी दूरदर्शिता,
  • शिक्षा के प्रति समर्पण,
  • समाज-सुधार की भावना,
  • राष्ट्र-निर्माण का जज्बा

आज भी सागर और पूरे देश के लिए प्रकाशस्तंभ बना हुआ है।


156वीं जन्म जयंती पर सागर उनका शत-शत नमन करता है

सागरवासियों के लिए वे केवल एक महापुरुष नहीं, बल्कि “शिक्षा, त्याग और राष्ट्रप्रेम की साकार प्रतिमा” हैं।
गरीबी से उठकर विश्वस्तरीय विद्वान बनने की उनकी यात्रा हर युवा के लिए प्रेरक है। उनके विचार और कार्य हमें यह संदेश देते हैं कि—
“दृढ़ निश्चय और निरंतर प्रयास से जीवन में किसी भी ऊंचाई को प्राप्त किया जा सकता है।”

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