सागर की सड़कों पर उस दिन एक अलग ही हलचल थी। पत्रकार मुकुल शुक्ला, जो अब तक अपनी कलम से अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते आए थे, खुद एक ऐसी परिस्थिति में थे जहाँ न्याय उनसे कोसों दूर लग रहा था।
मुकुल, जो पत्रकारिता को एक मिशन की तरह जीते थे, अपने ही शहर में अवैध उत्खनन के एक मामले की पड़ताल कर रहे थे। वह अपने पेशे की गरिमा को बनाए रखते हुए, सीधे जिला खनिज अधिकारी अनित पंड्या के कार्यालय पहुंचे। उनकी मंशा केवल इतनी थी कि प्रशासन से कुछ जवाब मिलें—लेकिन वहाँ जो हुआ, उसने उनके आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुंचाई।
अधिकारी ने न सिर्फ उनके सवालों को अनसुना किया, बल्कि उनके हाथ से मोबाइल छीन लिया, गालियाँ दीं और धक्के मारकर बाहर निकाल दिया। एक पत्रकार, जिसकी कलम में सच की ताकत थी, उसे इस तरह अपमानित किया गया मानो वह कोई अपराधी हो। यह सब कैमरे में कैद हो चुका था, लेकिन मुकुल के लिए यह सिर्फ एक घटना नहीं थी—यह उनके जीवन की सबसे बड़ी बेइज्जती थी।

अपमान की आग में जलते हुए मुकुल इंसाफ की गुहार लगाने थाने पहुंचे। उन्हें उम्मीद थी कि पुलिस उनकी शिकायत दर्ज करेगी, लेकिन वहाँ भी उन्हें सिर्फ दिलासा ही मिला। थाने में बैठे अधिकारी ने बिना भावनाओं के कहा, “हम जाँच करेंगे, तब देखेंगे कि क्या करना है।”
मुकुल को लगा जैसे उनके जीवन के सारे संघर्ष, उनकी सारी मेहनत, सब व्यर्थ हो गए थे। यह वही पुलिस थी जो भ्रष्ट अधिकारियों की शिकायत पर तुरंत कार्रवाई करती थी, लेकिन जब एक पत्रकार न्याय मांगने आया तो सिर्फ जाँच का आश्वासन मिला।
गुस्से और निराशा से भरे मुकुल ने फैसला किया कि अब चुप रहना नामुमकिन है। उन्होंने अपने साथियों को बुलाया, और देखते ही देखते सागर के लाल स्कूल तिराहे पर पत्रकारों की भीड़ जुट गई। चक्काजाम शुरू हुआ। पत्रकारों की आवाज़ें गूंजने लगीं—”पत्रकारों का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान!”
लेकिन यह आंदोलन केवल नारेबाजी तक सीमित नहीं रहा। मुकुल, जो अब तक शब्दों से लड़ाई लड़ते आए थे, उन्होंने खुद पर केरोसिन डाल लिया। उनके आंसू बह रहे थे, लेकिन किसी को भी समझ नहीं आ रहा था कि यह आंसू डर के थे, गुस्से के थे या उस घुटन के थे, जो उन्होंने इतने वर्षों में सहन की थी।

भीड़ में से किसी ने चिल्लाकर कहा, “मुकुल! ये क्या कर रहे हो?”
पर मुकुल की आवाज़ कांपते हुए निकली, “अगर सच कहना गुनाह है, तो मैं इस गुनाह की सज़ा भुगतने के लिए तैयार हूँ!”
कुछ पत्रकार दौड़कर उनके पास पहुंचे और उनके हाथ से माचिस छीन ली। वहाँ मौजूद पुलिसकर्मी, जो अब तक तमाशबीन बने खड़े थे, तुरंत हरकत में आए और मुकुल को शांत कराया। लेकिन मुकुल की आँखों में जो दर्द था, वह किसी से छिपा नहीं था।
यह खबर आग की तरह फैली। सागर के पूर्व मंत्री गोपाल भार्गव तक यह खबर पहुँची, और वे खुद प्रदर्शन स्थल पर आ गए। उन्होंने प्रशासन से बात करने का भरोसा दिलाया, लेकिन मुकुल की आँखों में भरोसे की जगह सिर्फ निराशा थी। “हमें केवल आश्वासन नहीं, न्याय चाहिए!” यह कहते हुए उनकी आवाज़ लड़खड़ा गई।
रात हो गई। प्रदर्शनकारी वहीं खड़े रहे, लेकिन जिला प्रशासन और पुलिस के किसी भी बड़े अधिकारी ने वहाँ आने की जरूरत नहीं समझी। मुकुल और उनके साथी पूरी रात इस सोच में बैठे रहे कि क्या सच की लड़ाई इतनी मुश्किल हो गई है कि न्याय मांगने के लिए अपनी जान तक जोखिम में डालनी पड़े?
आज फिर पत्रकार पुलिस अधीक्षक कार्यालय का घेराव करने वाले हैं। उनकी माँगें वही हैं—मुकुल शुक्ला के खिलाफ झूठे केस को वापस लिया जाए, खनिज अधिकारी अनित पंड्या के खिलाफ कार्रवाई की जाए, और पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
लेकिन अब सवाल उठता है—क्या प्रशासन इस आवाज़ को सुनेगा? या फिर मुकुल को अपनी सच्चाई की कीमत और भारी चुकानी पड़ेगी?
✒️✒️ भूपेन्द्र सिंह, रिपब्लिक सागर मीडिया