मध्यप्रदेश में मातृ और शिशु स्वास्थ्य की स्थिति लंबे समय से चिंता का विषय बनी हुई है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में हर एक लाख प्रसव पर 159 महिलाओं की मौत हो रही है, जबकि हर हजार जन्मे बच्चों में 40 नवजात अपनी जान गंवा देते हैं। ये आंकड़े केवल आंकड़े नहीं, बल्कि उन परिवारों के दर्द को दर्शाते हैं जो समय पर इलाज, संसाधनों की कमी और सुरक्षित प्रसव सुविधाओं के अभाव में अपनों को खो देते हैं।
इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए AIIMS Bhopal ने एक अहम और सराहनीय पहल शुरू की है। अब गर्भावस्था, प्रसव या गर्भसमापन के 42 दिनों के भीतर हुई महिलाओं की मौत के मामलों में “क्लिनिकल ऑटोप्सी” की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। इस प्रक्रिया के जरिए मौत के वास्तविक कारणों का वैज्ञानिक तरीके से पता लगाया जा सकेगा।

क्या है क्लिनिकल ऑटोप्सी और क्यों है जरूरी?
अक्सर देखा जाता है कि गर्भावस्था के दौरान हुई मौतों की असली वजह स्पष्ट नहीं हो पाती। ऐसे में सुधार के लिए ठोस कदम उठाना मुश्किल हो जाता है। क्लिनिकल ऑटोप्सी इस समस्या का समाधान पेश करती है। यह एक मेडिकल जांच प्रक्रिया है, जिसमें शरीर के जरूरी हिस्सों का वैज्ञानिक परीक्षण कर मौत के वास्तविक कारणों का पता लगाया जाता है।
यह प्रक्रिया पारंपरिक मेडिको-लीगल ऑटोप्सी से पूरी तरह अलग है। इसमें पुलिस की कोई भूमिका नहीं होती और यह केवल परिवार की सहमति से की जाती है। इससे न केवल जांच प्रक्रिया सरल होती है, बल्कि परिजनों को भी किसी कानूनी झंझट का सामना नहीं करना पड़ता।
फ्री सेवा, पूरी पारदर्शिता
एम्स भोपाल में यह सेवा पूरी तरह निशुल्क है। करीब डेढ़ घंटे में ऑटोप्सी प्रक्रिया पूरी हो जाती है। जांच के बाद डॉक्टर हिस्टोपैथोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी रिपोर्ट तैयार करते हैं, जो कुछ ही दिनों में परिवार को उपलब्ध करा दी जाती है।
इससे परिजनों को यह समझने में मदद मिलती है कि मौत किन कारणों से हुई—क्या यह किसी बीमारी, जटिलता या लापरवाही का परिणाम था। साथ ही परिवार के सदस्य डॉक्टरों से सीधे बातचीत कर अपनी शंकाओं का समाधान भी कर सकते हैं।
सम्मान और संवेदनशीलता का पूरा ध्यान
इस पूरी प्रक्रिया में मृतक के सम्मान का विशेष ध्यान रखा जाता है। जांच के लिए केवल आवश्यक ऊतक ही लिए जाते हैं और बाद में सभी अंगों को सुरक्षित तरीके से शरीर में वापस रख दिया जाता है। शरीर को सिलकर परिवार को सौंपा जाता है और चेहरे को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाया जाता।
मध्यप्रदेश की चिंताजनक स्थिति
SRS मैटरनल बुलेटिन 2020-22 के अनुसार, मध्यप्रदेश का मातृ मृत्यु दर (MMR) 159 है, जो राष्ट्रीय औसत 88 से लगभग दोगुना है। यह स्थिति प्रदेश को देश के सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाले राज्यों में शामिल करती है।
तुलना करें तो उत्तरप्रदेश और छत्तीसगढ़ का MMR 141 है, जबकि ओडिशा 136 के साथ थोड़ा बेहतर स्थिति में है। वहीं केरल (18) और महाराष्ट्र (36) जैसे राज्य मातृ स्वास्थ्य सेवाओं में बेहतर मॉडल प्रस्तुत करते हैं।
नीतिगत सुधार में मिलेगी मदद
इस पहल का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि सरकार को मातृ मृत्यु के मामलों का सटीक और प्रमाणिक डेटा मिलेगा। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि किन कारणों से मौतें हो रही हैं और किन मामलों को रोका जा सकता था।
इस डेटा के आधार पर स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार, संसाधनों की कमी को दूर करने और बेहतर नीतियां बनाने में मदद मिलेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते मौत के असली कारणों की पहचान हो जाए, तो भविष्य में कई माताओं और नवजातों की जान बचाई जा सकती है।

भविष्य की दिशा
एम्स भोपाल की यह पहल न केवल मध्यप्रदेश बल्कि पूरे देश के लिए एक मॉडल बन सकती है। यदि इस तरह की सुविधाएं अन्य राज्यों में भी लागू की जाती हैं, तो मातृ मृत्यु दर को कम करने में बड़ा बदलाव संभव है।
गर्भावस्था के दौरान हर महिला को सुरक्षित और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिलना उसका अधिकार है। ऐसे में यह पहल एक मजबूत कदम है, जो न केवल सच्चाई सामने लाएगी बल्कि आने वाले समय में कई जिंदगियां बचाने में भी मददगार साबित होगी।