छतरपुर। जिले में केन नदी किनारे चल रहा ‘चिता आंदोलन’ रविवार को और तेज हो गया। केन-बेतवा लिंक परियोजना से विस्थापित हो रहे हजारों आदिवासियों ने अब सामूहिक भूख हड़ताल शुरू कर दी है।
आंदोलन के आठवें दिन प्रभावित गांवों के हजारों परिवारों ने अपने घरों में चूल्हा नहीं जलाया। बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों सहित सभी ने एकजुट होकर भोजन का त्याग किया और “खाना नहीं बनाएंगे, न्याय लेकर रहेंगे” के नारे लगाए।
चिताओं पर लेटकर विरोध, महिलाएं भी शामिल
भूख हड़ताल के बीच आंदोलन का स्वर और तीखा हो गया है। सैकड़ों महिलाएं अपने बच्चों के साथ नदी की जलधारा के बीच बनाई गई प्रतीकात्मक चिताओं पर लेट गईं। वहीं हजारों अन्य लोग नदी किनारे बैठकर “न्याय दो या मौत दो” के नारे लगाकर समर्थन कर रहे हैं।

आंदोलनकारियों के आरोप
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे जय किसान संगठन से जुड़े अमित भटनागर ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना है कि यह भूख हड़ताल प्रशासन की “दमनकारी और असंवेदनशील नीति” के खिलाफ है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि आंदोलनकारी झूठा मुआवजा नहीं, बल्कि अपनी जल, जंगल, जमीन और संस्कृति की रक्षा चाहते हैं।
आंदोलनकारियों का आरोप है कि प्रशासन द्वारा मेडिकल टीम और राशन-पानी की आपूर्ति तक सीमित कर दी गई है, जिससे मानवीय संकट की स्थिति बन रही है।
मांगें पूरी होने तक जारी रहेगा आंदोलन
नेतृत्वकर्ताओं ने साफ कहा है कि जब तक भूमि अधिग्रहण से जुड़ी वैधानिक प्रक्रियाएं (धारा 11, 15, 18 आदि) पूरी नहीं होंगी, तब तक ‘चिता आंदोलन’ और भूख हड़ताल जारी रहेगी।
प्रशासन की चेतावनी
जिले के कलेक्टर पार्थ जैसवाल ने आंदोलन को अवैध बताते हुए कहा है कि धारा 163 (पूर्व में धारा 144) का उल्लंघन करने पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। प्रशासन का दावा है कि करीब 90 प्रतिशत मुआवजा दिया जा चुका है।
हालांकि आंदोलनकारी इस दावे को खारिज कर रहे हैं और ग्राम सभा से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग पर अड़े हैं।
दर्दनाक हालात: बच्चों को नमक-पानी के साथ रोटी
आंदोलन में शामिल महिलाओं ने बताया कि हालात इतने खराब हैं कि बच्चों को सूखी रोटी भी नहीं मिल पा रही। मजबूरी में नमक-पानी में रोटी भिगोकर खिलानी पड़ रही है।
उनका कहना है—“सरकार ने सबकुछ छीन लिया, अब न्याय या मौत ही विकल्प है।”