मध्यप्रदेश के सागर जिले में अवैध और नियमों के विपरीत संचालित उद्योगों को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है। जिले के मकरोनिया क्षेत्र सहित अन्य इलाकों में ऐसे उद्योगों को कथित रूप से संरक्षण दिए जाने के आरोप लगाते हुए शिवसेना ने प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। संगठन ने संभाग आयुक्त अनिल सुचारी को ज्ञापन सौंपकर तत्काल कार्रवाई की मांग की है।
यह मामला केवल अवैध उद्योगों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें पर्यावरण संरक्षण, प्रशासनिक पारदर्शिता और भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मुद्दे भी जुड़े हुए हैं। आरोपों के अनुसार, क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी नियमों को दरकिनार कर उद्योगों को संचालन की अनुमति दे रहे हैं, जिससे पर्यावरण और आम जनता दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
शिवसेना के उप राज्य प्रमुख पप्पू तिवारी ने आरोप लगाया कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी बिना मौके पर निरीक्षण किए ही उद्योगों को “कंसेंट टू ऑपरेट” प्रमाण पत्र जारी कर रहे हैं। यह प्रमाण पत्र किसी भी उद्योग के संचालन के लिए आवश्यक होता है, और इसे जारी करने से पहले पर्यावरणीय मानकों की जांच अनिवार्य होती है।
लेकिन संगठन का दावा है कि अधिकारी कथित रूप से रिश्वत लेकर कार्यालय में बैठकर ही अनुमति दे रहे हैं। यदि यह आरोप सही हैं, तो यह न केवल नियमों का उल्लंघन है बल्कि पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के साथ गंभीर खिलवाड़ भी है।

सागर के मकरोनिया क्षेत्र में कई हॉस्पिटल, होटल, स्टोन क्रेशर और मोटरसाइकिल शोरूम संचालित हो रहे हैं। आरोप है कि इनमें से कई संस्थान वर्षों से आवश्यक पर्यावरणीय दस्तावेज, जैसे प्रदूषण विवरण (फॉर्म-5), जमा नहीं कर रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें बार-बार संचालन की अनुमति मिल रही है।
यह स्थिति प्रशासनिक निगरानी की कमी और संभावित मिलीभगत की ओर इशारा करती है। यदि उद्योग बिना नियमों का पालन किए चल रहे हैं, तो इससे वायु, जल और भूमि प्रदूषण बढ़ने की संभावना भी बढ़ जाती है।
जिला प्रभारी विकास सिंह ने आरोप लगाया कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड “वसूली का अड्डा” बन गया है। उन्होंने कहा कि जिले में लगभग 135 रेड और ऑरेंज जोन के उद्योग संचालित हैं, लेकिन विभाग के पास इनके प्रदूषण की कोई वैज्ञानिक जांच रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है।
रेड और ऑरेंज जोन में आने वाले उद्योग वे होते हैं, जो पर्यावरण पर अधिक प्रभाव डालते हैं और जिनके लिए सख्त नियम बनाए गए हैं। ऐसे उद्योगों की नियमित जांच और निगरानी जरूरी होती है, लेकिन यदि जांच ही नहीं हो रही, तो यह गंभीर लापरवाही है।
आरोप यह भी है कि कई उद्योगों में ईटीपी, एसटीपी, और एएसपी केवल दिखावे के लिए लगाए गए हैं। ये उपकरण प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए जरूरी होते हैं, लेकिन यदि इनका सही तरीके से उपयोग नहीं किया जा रहा, तो इनकी मौजूदगी का कोई मतलब नहीं रह जाता।
यह स्थिति न केवल नियमों की अनदेखी है, बल्कि यह दर्शाती है कि उद्योग केवल कागजी औपचारिकताओं को पूरा कर रहे हैं, जबकि वास्तविकता में प्रदूषण फैल रहा है।
अवैध और अनियमित उद्योगों का सीधा असर पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। वायु प्रदूषण से सांस संबंधी बीमारियां बढ़ सकती हैं, जबकि जल प्रदूषण से पीने के पानी की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इसके अलावा, भूमि प्रदूषण से खेती और खाद्य उत्पादन पर भी असर पड़ता है।
सागर जैसे तेजी से विकसित हो रहे क्षेत्र में यदि उद्योगों पर नियंत्रण नहीं रखा गया, तो आने वाले समय में यह समस्या और गंभीर हो सकती है।
प्रशासन से कार्रवाई की मांग
शिवसेना ने अपने ज्ञापन में मांग की है कि सभी उद्योगों की निष्पक्ष जांच कराई जाए और जो भी संस्थान नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। साथ ही, भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों के खिलाफ भी जांच और कार्रवाई की मांग की गई है।
संगठन का कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं की गई, तो वे इस मुद्दे को लेकर बड़े स्तर पर आंदोलन करेंगे।
यह मामला प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता को उजागर करता है। प्रदूषण नियंत्रण जैसे संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी प्रकार की लापरवाही या भ्रष्टाचार गंभीर परिणाम ला सकता है।
सरकार और प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी नियमों का सख्ती से पालन हो और किसी भी प्रकार की अनियमितता को बर्दाश्त न किया जाए।