इंदौर में PWD के 3 अफसर रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार, बिल पास करने के बदले मांगे थे 3.50 लाख रुपए !

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मध्य प्रदेश के इंदौर में लोक निर्माण विभाग (PWD) में भ्रष्टाचार का एक बड़ा मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लोकायुक्त पुलिस ने एक सुनियोजित ट्रैप कार्रवाई करते हुए विभाग के तीन अधिकारियों को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किया है। इस कार्रवाई के बाद न केवल विभाग में बल्कि पूरे प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मच गया है।

गिरफ्तार किए गए अधिकारियों में जयदेव गौतम (कार्यपालन यंत्री, PWD संभाग-1), टीके जैन (अनुविभागीय अधिकारी) और अंशु दुबे (उपयंत्री) शामिल हैं। तीनों पर आरोप है कि उन्होंने एक ठेकेदार से उसके अंतिम बिल के भुगतान के एवज में 3.50 लाख रुपए की रिश्वत की मांग की थी। यह मामला उस समय उजागर हुआ जब ठेकेदार ने इस अवैध मांग से परेशान होकर लोकायुक्त कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई।

शिकायतकर्ता राजपाल सिंह पंवार, जो धार जिले के निवासी हैं और पटेल इंटरप्राइजेस नामक फर्म के संचालक हैं, ने वर्ष 2023 में मैथवाड़ा फोरलेन पहुंच मार्ग के निर्माण का ठेका लिया था। यह परियोजना 4.73 करोड़ रुपए की लागत से स्वीकृत हुई थी, जिसे पंवार की फर्म ने निर्धारित समय में 4.51 करोड़ रुपए में सफलतापूर्वक पूरा कर दिया। निर्माण कार्य पूरा होने के बाद जब उन्होंने अपने अंतिम बिल के भुगतान की प्रक्रिया शुरू की, तभी संबंधित अधिकारियों ने भुगतान जारी करने के बदले रिश्वत की मांग रख दी।

ठेकेदार ने पहले इस मांग को नजरअंदाज करने की कोशिश की, लेकिन जब दबाव लगातार बढ़ता गया, तब उन्होंने लोकायुक्त से संपर्क किया। शिकायत मिलने के बाद लोकायुक्त टीम ने मामले की गोपनीय जांच की और आरोपों की पुष्टि होने पर एक विशेष ट्रैप टीम का गठन किया गया। इस टीम ने पूरी योजना के तहत कार्रवाई को अंजाम दिया।

कार्रवाई के दौरान जयदेव गौतम को उनके शासकीय निवास से 1.50 लाख रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किया गया। वहीं, टीके जैन को कार्यालय परिसर के पोर्च के नीचे से 1 लाख रुपए लेते हुए पकड़ा गया। तीसरे आरोपी अंशु दुबे ने भी 1 लाख रुपए की मांग की थी, लेकिन शिकायतकर्ता के पास पूरी राशि उपलब्ध नहीं होने के कारण उसने पैसे नहीं लिए। इस तरह पूरी कार्रवाई में कुल 2.50 लाख रुपए की रिश्वत राशि जब्त की गई।

लोकायुक्त अधिकारियों के अनुसार, यह कार्रवाई पूरी तरह से योजनाबद्ध तरीके से की गई थी, ताकि आरोपियों को रंगे हाथ पकड़ा जा सके और उनके खिलाफ मजबूत साक्ष्य जुटाए जा सकें। ट्रैप टीम में टीआई आशुतोष मिठास, प्रतिभा तोमर और विवेक मिश्रा सहित अन्य अधिकारी शामिल थे। यह पूरी कार्रवाई लोकायुक्त के महानिदेशक योगेश देशमुख और उप पुलिस महानिरीक्षक मनोज कुमार सिंह के निर्देशन में संपन्न हुई।

गिरफ्तारी के बाद तीनों अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम 2018 की धारा 7 और भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 61(2) के तहत प्रकरण दर्ज किया गया है। इन धाराओं के तहत रिश्वत लेना और पद का दुरुपयोग करना गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है, जिसके लिए कठोर सजा का प्रावधान है।

फिलहाल लोकायुक्त टीम मामले की गहन जांच कर रही है। अधिकारियों के बैंक खातों, संपत्तियों और अन्य वित्तीय लेन-देन की भी जांच की जा रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं यह मामला बड़े भ्रष्टाचार नेटवर्क का हिस्सा तो नहीं है। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि क्या अन्य परियोजनाओं में भी इसी प्रकार की अनियमितताएं हुई हैं।

इस घटना ने एक बार फिर सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार की वास्तविकता को उजागर किया है। आमतौर पर देखा जाता है कि ठेकेदारों को उनके काम का भुगतान समय पर नहीं मिलता और उन्हें रिश्वत देने के लिए मजबूर किया जाता है। इससे न केवल परियोजनाओं की गुणवत्ता प्रभावित होती है, बल्कि ईमानदार काम करने वालों का मनोबल भी टूटता है।

हालांकि, इस कार्रवाई से यह स्पष्ट संकेत गया है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार और जांच एजेंसियां सख्त रुख अपना रही हैं। लोकायुक्त की इस कार्रवाई को एक मजबूत संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि रिश्वतखोरी करने वालों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा।

इंदौर में हुई यह कार्रवाई प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक चेतावनी है। यह न केवल भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ सख्ती का उदाहरण है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि यदि कोई व्यक्ति हिम्मत करके शिकायत करता है, तो उसे न्याय मिल सकता है। आने वाले समय में इस तरह की कार्रवाइयों से सरकारी तंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ने की उम्मीद है।

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