सागर
सागर जिले में समर्थन मूल्य पर हो रही चना और मसूर की खरीदी में बड़े स्तर पर अनियमितता और अवैध वसूली का मामला सामने आया है। सरकार जहां किसानों को उचित मूल्य और पारदर्शी खरीदी का दावा करती है, वहीं जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। आरोप है कि उपार्जन केंद्रों पर किसानों से प्रति क्विंटल 150 से 200 रुपए तक “कमीशन” वसूला जा रहा है, जिसके बिना उनकी उपज की तुलाई तक नहीं की जा रही।
सर्वेयर और समिति प्रबंधन पर आरोप
किसानों का कहना है कि इस अवैध वसूली में उपार्जन केंद्रों के सर्वेयर और समिति प्रबंधक मिलकर काम कर रहे हैं। यदि कोई किसान विरोध करता है, तो उसकी उपज की तुलाई में देरी की जाती है या बिल बनाने में जानबूझकर अड़चनें डाली जाती हैं। इससे मजबूर होकर किसान रिश्वत देने को विवश हो जाते हैं।
करोड़ों रुपए की अवैध वसूली का अनुमान
जिले में अब तक 69 उपार्जन केंद्रों पर 8203 किसानों से 2 लाख 13 हजार 368 क्विंटल चना और मसूर की खरीदी की जा चुकी है। इसमें 1,41,261 क्विंटल मसूर और 72,107 क्विंटल चना शामिल है।
यदि औसतन 150 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से वसूली मानी जाए, तो अब तक करीब 3 करोड़ 24 लाख 55 हजार रुपए किसानों से अवैध रूप से वसूले जा चुके हैं।

- मसूर पर अनुमानित वसूली: 2 करोड़ 11 लाख 89 हजार 150 रुपए
- चना पर अनुमानित वसूली: 1 करोड़ 12 लाख 66 हजार 50 रुपए
यह आंकड़े इस बात की ओर इशारा करते हैं कि यह कोई छोटी अनियमितता नहीं, बल्कि संगठित स्तर पर हो रहा भ्रष्टाचार है।
स्टिंग ऑपरेशन में सामने आई सच्चाई
एक स्टिंग ऑपरेशन में प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति सहजपुरी के केंद्र पर सर्वेयर अभिषेक साहू को किसान से खुलेआम कमीशन मांगते हुए रिकॉर्ड किया गया।
उन्होंने 14 क्विंटल चना पर 3 हजार रुपए की मांग की। बातचीत में उन्होंने साफ कहा कि “200 रुपए प्रति क्विंटल लगेंगे, इसमें कोई कमी नहीं होगी।”
यह स्टिंग इस बात का प्रमाण है कि खरीदी प्रक्रिया में भ्रष्टाचार किस हद तक फैल चुका है।
किसानों की आपबीती: तीन मामलों से खुलासा
केस-1:
बीना के कंजिया केंद्र पर एक किसान ने 85 क्विंटल उपज बेची। उससे 100 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से 8500 रुपए वसूले गए। किसान का कहना है कि पैसे देने के बाद ही तुलाई और भुगतान संभव हुआ।
केस-2:
समनापुर के किसान रमन चौबे से 14 क्विंटल चना पर 3 हजार रुपए मांगे गए। बाद में “समझौते” के बाद 1500 रुपए में मामला तय हुआ, जो ऑनलाइन ट्रांसफर किए गए।
केस-3:
एक अन्य किसान से 41 क्विंटल मसूर पर 7500 रुपए लिए गए। किसान का कहना है कि हर किसान से इस तरह की वसूली की जा रही है।
सर्वेयर तय करता है ‘रेट’
जानकारी के अनुसार, उपार्जन केंद्रों पर कमीशन की राशि सर्वेयर द्वारा तय की जाती है। कुछ मामलों में बड़े किसानों से सीधे प्रबंधक स्तर पर बातचीत कर अलग-अलग बैंक खातों में पैसे जमा कराए जाते हैं।
चितौरा क्षेत्र के अनिरुद्ध वेयरहाउस में संचालित खरीदी केंद्र पर भी इसी तरह की शिकायतें सामने आई हैं, जहां बिना “कमीशन” दिए किसानों की उपज की तुलाई नहीं की जाती।
किसान बोले—मजबूरी में दे रहे पैसे
किसानों का कहना है कि वे पहले ही लागत, मौसम और बाजार की मार झेल रहे हैं। ऐसे में जब उपज बेचने जाते हैं, तो वहां भी उन्हें रिश्वत देनी पड़ती है।
एक किसान ने कहा, “अगर पैसे नहीं दो, तो कई-कई दिन तक तुलाई नहीं होती। हमें मजबूरी में देना पड़ता है, क्योंकि घर चलाना है।”
प्रशासन और व्यवस्था पर सवाल
इस पूरे मामले ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
- क्या अधिकारियों को इस वसूली की जानकारी नहीं है?
- यदि जानकारी है, तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
- क्या यह संगठित भ्रष्टाचार का मामला है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो किसानों का सरकारी खरीदी व्यवस्था से भरोसा उठ सकता है।सागर जिले में सामने आया यह मामला केवल एक जिले की समस्या नहीं, बल्कि पूरी खरीदी व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है। समर्थन मूल्य जैसी योजनाएं किसानों के हित में बनाई जाती हैं, लेकिन जब जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार हावी हो जाता है, तो इनका उद्देश्य ही खत्म हो जाता है।
अब जरूरत है कि प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेते हुए दोषियों पर सख्त कार्रवाई करे, ताकि किसानों को उनका हक बिना किसी अवैध वसूली के मिल सके।