“मां” सिर्फ एक रिश्ता नहीं, बल्कि त्याग, ममता और निस्वार्थ प्रेम की सबसे बड़ी पहचान है। मां केवल बच्चे को जन्म ही नहीं देती, बल्कि जरूरत पड़ने पर अपने शरीर का हिस्सा देकर उसे नई जिंदगी भी देती है। एम्स भोपाल से सामने आए आंकड़े मातृत्व के इसी भावुक और साहसी रूप को उजागर कर रहे हैं।
एम्स भोपाल में अब तक हुए करीब 16 किडनी ट्रांसप्लांट मामलों में लगभग 50 प्रतिशत मामलों में मां ने अपनी किडनी देकर अपने बच्चों की जान बचाई है। यह सिर्फ एक मेडिकल उपलब्धि नहीं, बल्कि उस ममता की कहानी है, जो अपने बच्चे के लिए हर दर्द सहने को तैयार रहती है।
जब जिंदगी डायलिसिस तक सिमट जाती है
किडनी फेल होने के बाद मरीज की जिंदगी पूरी तरह बदल जाती है। नियमित डायलिसिस, दवाइयों का बोझ और अस्पतालों के लगातार चक्कर पूरे परिवार को मानसिक और आर्थिक रूप से तोड़ देते हैं।
ऐसे समय में जब डॉक्टर किडनी ट्रांसप्लांट को आखिरी विकल्प बताते हैं, तब परिवार में सबसे पहले मां ही डोनर बनने के लिए आगे आती है। मां यह जानती है कि ऑपरेशन के बाद उसे खुद भी कई सावधानियां रखनी होंगी और शरीर पर असर पड़ेगा, लेकिन उसके लिए बच्चे की जिंदगी सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होती है।
ट्रांसप्लांट सफल होने के बाद जब बच्चा दोबारा सामान्य जीवन जीने लगता है, तब वही पल मां के लिए सबसे बड़ा सुकून बन जाता है।

मां ने बेटे को दी दूसरी जिंदगी
ऐसी ही एक भावुक कहानी 28 वर्षीय पुष्पेंद्र कुर्मी की है। पिछले साल अगस्त में उनका किडनी ट्रांसप्लांट हुआ था। उनकी मां कविता कुर्मी ने अपनी एक किडनी दान कर बेटे को नई जिंदगी दी।
पुष्पेंद्र बताते हैं कि शुरुआत में दवाइयों के जरिए इलाज चल रहा था, लेकिन बाद में जांच में पता चला कि उनकी दोनों किडनी खराब हो चुकी हैं। यह खबर सुनते ही पूरा परिवार डर और चिंता में डूब गया।
उन्होंने बताया कि उस मुश्किल समय में उनकी मां बिना डरे तुरंत किडनी डोनेट करने के लिए तैयार हो गईं।
पुष्पेंद्र भावुक होकर कहते हैं, “मेरी मां ने सिर्फ मुझे सहारा नहीं दिया, बल्कि अपनी एक किडनी देकर मुझे दूसरी जिंदगी दी है। मैंने भगवान को कभी नहीं देखा, लेकिन मेरे लिए मेरी मां ही भगवान हैं।”
किडनी ट्रांसप्लांट में सबसे आगे माताएं
एम्स भोपाल के यूरोलॉजिस्ट केतन मेहरा के अनुसार किडनी ट्रांसप्लांट के मामलों में लगभग 80 प्रतिशत डोनर महिलाएं होती हैं और इनमें सबसे अधिक संख्या माताओं की रहती है।
उन्होंने बताया कि मेडिकल साइंस के अनुसार मां और बच्चे के बीच मजबूत जेनेटिक कनेक्शन होता है। इसी वजह से कई मामलों में किडनी मैच होने की संभावना अधिक रहती है, जिससे ट्रांसप्लांट सफल होने की उम्मीद भी बढ़ जाती है।
डॉ. मेहरा कहते हैं कि जब परिवार को ट्रांसप्लांट की जरूरत बताई जाती है, तब अक्सर मां बिना अपने दर्द या भविष्य की चिंता किए तुरंत तैयार हो जाती है। यही निस्वार्थ भाव और ममता मां को सबसे अलग बनाती है।
त्याग और ममता की सबसे बड़ी मिसाल
डॉक्टरों के अनुसार अंगदान केवल एक मेडिकल प्रक्रिया नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से बेहद कठिन निर्णय होता है। इसके बावजूद माताएं अपने बच्चों के लिए बिना किसी हिचक के आगे आती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि समाज में अंगदान को लेकर जागरूकता बढ़ रही है, लेकिन मां-बच्चे का रिश्ता आज भी सबसे मजबूत उदाहरण बनकर सामने आता है। मां अपने बच्चे की मुस्कान और जीवन के लिए हर दर्द सहने को तैयार रहती है।
मातृत्व का भावुक चेहरा
मदर्स डे जैसे अवसरों पर ऐसी कहानियां यह एहसास कराती हैं कि मां का प्यार शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। वह केवल पालन-पोषण ही नहीं करती, बल्कि जरूरत पड़ने पर अपनी जिंदगी का हिस्सा भी बच्चे के नाम कर देती है।
एम्स भोपाल के ये आंकड़े बताते हैं कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के बीच भी मां की ममता सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आती है। जहां एक ओर डॉक्टर विज्ञान से जिंदगी बचाते हैं, वहीं दूसरी ओर मां अपने त्याग और प्रेम से उस जिंदगी को नया अर्थ देती है।