सागर जिले के कलेक्टर कार्यालय में मंगलवार को एक हृदयविदारक घटना सामने आई, जब जनसुनवाई में शिकायत लेकर पहुंची भूरीबाई अहिरवार ने आत्महत्या करने का प्रयास किया। जनसुनवाई में सुनवाई न होने से निराश भूरीबाई ने परिसर में एक पेड़ से फांसी लगाने की कोशिश की। समय पर सुरक्षाकर्मियों और अन्य लोगों ने महिला को ऐसा करने से रोक लिया और उसे समझाकर शांत कराया। यह घटना जिले में प्रशासनिक व्यवस्था और न्याय प्रक्रिया पर सवाल खड़े करती है।

घटना का विवरण
भूरीबाई अहिरवार, जो खिमलासा थाना क्षेत्र के बसाहरी गांव की निवासी हैं, ने बताया कि उन्हें वर्ष 2002 में मध्यप्रदेश शासन द्वारा मौजा बसाहरी में 0.63 हेक्टेयर जमीन का पट्टा आवंटित किया गया था। उन्होंने कुछ वर्षों तक उस जमीन पर खेती की। लेकिन पति सुखलाल अहिरवार के अचानक गायब होने और परिवार की परिस्थितियों के चलते उन्होंने जमीन पर खेती बंद कर दी।
इस बीच, गांव की एक अन्य महिला ने कथित तौर पर उनके पति को बहलाकर उस जमीन को अपने नाम करवा लिया। भूरीबाई को इस घटना की जानकारी बाद में मिली, जिसके बाद उन्होंने अपने हक के लिए तहसील कार्यालय से लेकर भोपाल तक शिकायत दर्ज कराई। हालांकि, पांच वर्षों से सरकारी दफ्तरों के लगातार चक्कर काटने के बावजूद उन्हें न्याय नहीं मिल पाया।
जनसुनवाई में न सुनवाई, न समाधान
मंगलवार को आयोजित जनसुनवाई में भी भूरीबाई को कोई स्पष्ट उत्तर या समाधान नहीं मिला। उनकी निराशा चरम पर पहुंच गई, जिसके कारण उन्होंने आत्महत्या का प्रयास किया। घटना के बाद कलेक्टर कार्यालय में प्रशासन ने तुरंत मामले को गंभीरता से लेते हुए महिला को शांत कराया और समस्या की जांच शुरू की।

प्रशासन की प्रतिक्रिया
मामले के तूल पकड़ने के बाद कलेक्टर कार्यालय के अधिकारियों ने आश्वासन दिया कि महिला की शिकायत पर प्राथमिकता से जांच की जाएगी। तहसील और राजस्व विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे जमीन से संबंधित दस्तावेजों की विस्तृत जांच करें और वास्तविकता का पता लगाएं।
अधिकारियों ने बताया कि:
- भूरीबाई के दावे की पुष्टि के लिए उनके पट्टे के दस्तावेज और विवादित महिला के नाम पर किए गए हस्तांतरण के रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं।
- यदि हस्तांतरण में अनियमितताएं पाई जाती हैं तो संबंधित अधिकारियों और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होगी।

समाज पर प्रभाव और प्रशासनिक चुनौतियां
यह घटना प्रशासन के लिए एक चेतावनी है कि ग्रामीण इलाकों में जमीन विवाद से जुड़े मामलों को गंभीरता से न सुलझाना आम नागरिकों को चरम कदम उठाने के लिए मजबूर कर सकता है। खासकर हाशिये पर रहने वाले समुदाय, जैसे कि अनुसूचित जाति या कमजोर वर्ग के लोग, अक्सर न्याय पाने के लिए संघर्ष करते रहते हैं। भूरीबाई अहिरवार की घटना एक व्यक्ति की त्रासदी से कहीं अधिक है; यह न्याय और प्रशासनिक पारदर्शिता की मांग है। यह आवश्यक है कि प्रशासन न केवल इस मामले को सुलझाए, बल्कि ऐसे अन्य मामलों के लिए एक प्रणाली बनाए ताकि गरीब और हाशिये पर रहने वाले लोगों को न्याय पाने के लिए इस हद तक न जाना पड़े।