देवरी विकासखंड के बिछुआ भावतरा गांव की महिलाएं अब केवल घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि सब्जी उत्पादन और थोक व्यापार के माध्यम से उन्होंने आत्मनिर्भरता की नई मिसाल कायम की है। आस्था स्व सहायता समूह से जुड़ी श्रीमती शांति पटेल और उनकी साथिनों की कहानी आज पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा बन गई है।

श्रीमती शांति पटेल ने समूह से अलग-अलग किश्तों में करीब 3 लाख रुपए का लोन लेकर सब्जी की थोक खरीद-फरोख्त का कार्य शुरू किया। साथ ही अपने खेतों में सब्जी उत्पादन भी शुरू किया। उनका कहना है कि प्याज, टमाटर, मिर्ची, गिलकी, बैंगन और खीरा इस क्षेत्र की मुख्य सब्जियाँ हैं, जिनकी वे खेती करती हैं और देवरी में स्थित दुकान के माध्यम से आसपास के किसानों से थोक में खरीदकर झांसी, ललितपुर, महोबा, लखनऊ, जबलपुर, भोपाल, नरसिंहपुर और करेली जैसे बड़े बाजारों में भेजती हैं।
मुनाफे की बात करें, तो सीजन के समय प्रतिदिन 20,000 से 50,000 रुपए तक का शुद्ध लाभ उन्हें प्राप्त होता है। शांति ने बताया कि इसी व्यापार की बदौलत उन्होंने अपनी दो नंदों का विवाह भव्य रूप से किया, जिसमें लगभग 10 लाख रुपए खर्च हुए। वर्तमान में उनके पास दोपहिया वाहन, कृषि यंत्र, पक्के मकान और बच्चों की इंग्लिश मीडियम में पढ़ाई जैसी सभी आधुनिक सुविधाएं हैं।

इसी समूह से जुड़ीं श्रीमती निर्मला पटेल ने भी अपनी खेती में पाली हाउस, मल्चिंग और ड्रिप सिस्टम को अपनाया है। उन्होंने बताया कि उनके खेतों में अभी खीरा लगा है, जिसकी तुड़ाई सप्ताह में दो बार होती है और प्रत्येक तुड़ाई में लगभग 12 क्विंटल खीरा निकलता है। खीरे की फसल के बाद वे टमाटर लगाती हैं, जो लगातार चार माह तक प्रतिदिन 10-12 क्विंटल तक उपज देता है।
वहीं इसी ग्राम की श्रीमती अनुराधा काछी ने नेट हाउस तैयार कर उसमें धनिया की खेती शुरू की है। अनुराधा बताती हैं कि बरसात में धनिया की कीमतें आसमान छूती हैं। पिछले वर्ष उनके धनिया की बिक्री दर 60,000 रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंची थी।
दूसरी ओर, ग्राम जमनापुर परासिया की श्रीमती संगीता कुर्मी ने अपने परी स्व सहायता समूह से अब तक 4 लाख रुपए का लोन लेकर भैंस पालन, खेती और दूध संग्रहण केन्द्र का संचालन शुरू किया है। उनका सपना था कि रक्षा बंधन के दिन वह अपने भाई को अपनी खुद की कार से राखी बांधने जाएं – और इस वर्ष यह सपना पूरा होने जा रहा है।
सागर कलेक्टर श्री संदीप जी.आर. ने इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि, “महिलाओं ने आधुनिक तकनीकी अपनाकर हाई वैल्यू और हाई प्रोडक्शन वेजिटेबल क्रॉप्स को अपनाया है, जिससे ना केवल उनका जीवन स्तर सुधरा है, बल्कि वे आत्मनिर्भरता की मिसाल भी बनी हैं। थोक व्यापार और समूह से जुड़कर महिलाओं ने परिवार की आर्थिक दशा को पूरी तरह बदल दिया है।”
ये कहानियाँ सिर्फ महिला सशक्तिकरण की नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के मजबूत होने की भी गवाही देती हैं।