मध्यप्रदेश के इंदौर जिले में आदिवासी किसानों की जमीन को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। आरोप है कि 29 आदिवासी परिवारों की करीब 44 एकड़ पुश्तैनी कृषि भूमि को नियमों की अनदेखी कर उद्योग को दे दिया गया। इस मामले ने प्रशासनिक प्रक्रिया, भूमि अधिकार और आदिवासी कानूनों के पालन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
1976 में मिली थी जमीन, अब छिनने का आरोप
यह मामला पीथमपुर के पास काली बिल्लोद गांव का है। वर्ष 1976 में सरकार ने अनुसूचित जनजाति (ST) के 29 परिवारों को योजना के तहत यह जमीन आवंटित की थी। उस समय इन परिवारों को वन भूमि पर काबिज मानते हुए पट्टे दिए गए और बाद में राजस्व विभाग ने इन्हें वैध भू-अधिकार प्रमाण भी जारी किए।
किसानों का कहना है कि वे पीढ़ियों से इस जमीन पर खेती करते आ रहे थे, लेकिन अब उन्हें उससे बेदखल किया जा रहा है।

नजूल घोषित कर बदल दिया जमीन का स्वरूप
विवाद की जड़ यह है कि प्रशासन ने इस जमीन को अचानक “नजूल भूमि” घोषित कर दिया। नजूल भूमि वह होती है, जिस पर सरकार का स्वामित्व माना जाता है। किसानों का आरोप है कि उनकी कृषि भूमि को गलत तरीके से इस श्रेणी में डालकर उनसे अधिकार छीन लिए गए।
इसके बाद मार्च 2025 में जमीन को औद्योगिक केंद्र विकास निगम (AKVN) को सौंपा गया और फिर एक निजी कंपनी को लीज पर दे दिया गया।
उद्योग को लीज, किसानों को बेदखली
बताया जा रहा है कि इस जमीन को “शक्ति पंप इंडस्ट्रीज” को लीज पर दिया गया है। किसानों का आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया बिना किसी सूचना, सुनवाई या सहमति के पूरी की गई।
ग्रामीणों के अनुसार, जब वे अपने खेतों पर पहुंचे तो वहां प्रशासन, पुलिस और कंपनी के लोग मौजूद थे और उन्हें वहां से हटने के लिए दबाव बनाया गया। इससे गांव में तनाव का माहौल बन गया।

रिकॉर्ड में हेरफेर का आरोप
किसानों ने नामांतरण प्रक्रिया में गड़बड़ी और दस्तावेजों में बदलाव का भी आरोप लगाया है। उनका कहना है कि वारिसों के नाम अपडेट नहीं किए गए और इसी का फायदा उठाकर जमीन के रिकॉर्ड में बदलाव कर दिया गया।
यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही बल्कि गंभीर अनियमितता का मामला बन सकता है।
कानूनी लड़ाई शुरू, कोर्ट ने मांगा जवाब
मामले को लेकर 16 किसानों ने SC/ST स्पेशल कोर्ट में शिकायत दर्ज कराई है। कोर्ट ने इस पर संज्ञान लेते हुए राजस्व विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को नोटिस जारी किया है और 26 जून तक जवाब मांगा है।
इसके अलावा किसानों ने 22 अप्रैल को हाई कोर्ट में भी याचिका दायर की है, जिसमें कलेक्टर के आदेश को निरस्त करने की मांग की गई है। किसानों की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता का कहना है कि यह मामला कानूनों के स्पष्ट उल्लंघन का है।
कानूनों के उल्लंघन के आरोप
प्रभावित परिवारों का कहना है कि इस पूरे मामले में SC/ST Act और PESA Act जैसे महत्वपूर्ण कानूनों का उल्लंघन हुआ है।
इन कानूनों के तहत आदिवासी भूमि की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। बिना अनुमति या उचित प्रक्रिया के जमीन का हस्तांतरण करना अवैध माना जा सकता है।

जीविका संकट में, मजदूरी को मजबूर किसान
जमीन से बेदखली के बाद कई परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। जिन किसानों की आय का मुख्य स्रोत खेती था, वे अब मजदूरी करने को मजबूर हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यह सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व और सम्मान का भी सवाल है।
प्रशासन पर उठ रहे सवाल
इस पूरे मामले में जिला प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। क्या सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया? क्या किसानों को पर्याप्त मौका दिया गया? क्या रिकॉर्ड में बदलाव नियमों के तहत हुआ?
इन सवालों के जवाब अब कोर्ट में तय होंगे।
इंदौर का यह मामला सिर्फ एक जमीन विवाद नहीं, बल्कि आदिवासी अधिकारों, प्रशासनिक पारदर्शिता और कानून के पालन की परीक्षा है। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह एक गंभीर उदाहरण बन सकता है कि कैसे कमजोर वर्गों के अधिकारों को नजरअंदाज किया जा सकता है।
अब सभी की नजर कोर्ट के फैसले पर टिकी है, जो तय करेगा कि 29 आदिवासी परिवारों को न्याय मिलेगा या नहीं।