इंस्टाग्राम की एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन नीति पर विवाद, हाईकोर्ट में मेटा का पक्ष; निजता बनाम सुरक्षा पर बहस तेज !

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सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम की एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग सेवा को लेकर उठे विवाद ने कानूनी रूप ले लिया है। इस मामले में मेटा प्रबंधन ने बुधवार को हाईकोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि प्लेटफॉर्म पर एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग सेवा जारी रहेगी, लेकिन कुछ परिस्थितियों में सरकार को डेटा उपलब्ध कराने का प्रावधान जोड़ा गया है।

मेटा का दावा: एन्क्रिप्शन जारी, सिर्फ कानूनी सहयोग का प्रावधान

मेटा की ओर से कोर्ट में कहा गया कि उनकी नीति में कोई ऐसा बदलाव नहीं किया गया है जिससे सामान्य उपयोगकर्ताओं की चैट या डेटा सार्वजनिक हो जाए। कंपनी ने स्पष्ट किया कि:

  • एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन सेवा पहले की तरह जारी रहेगी
  • किसी भी तीसरे पक्ष को उपयोगकर्ताओं का डेटा नहीं दिया जाएगा
  • केवल कानून-व्यवस्था या आपराधिक मामलों में सरकार के अनुरोध पर आवश्यक जानकारी दी जाएगी

कंपनी का कहना है कि यह कदम केवल कानूनी अनुपालन और अपराध नियंत्रण के लिए है, न कि उपयोगकर्ता की निजता को कमजोर करने के लिए।

आठ मई से सेवा बदलाव की सूचना पर विवाद

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब इंस्टाग्राम ने सूचना जारी की कि वह 8 मई से अपनी एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग सेवा में बदलाव करेगा। इसी बदलाव को चुनौती देते हुए एक जनहित याचिका दायर की गई।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह नीति नागरिकों की निजता का उल्लंघन करती है और इससे उपयोगकर्ताओं के व्यक्तिगत संदेशों तक पहुंच संभव हो सकती है। याचिकाकर्ता के अनुसार यह संविधान में दिए गए निजता के अधिकार के खिलाफ है।

कपिल सिब्बल ने रखा मेटा का पक्ष

मेटा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट में दलील दी। उन्होंने कहा कि कंपनी पूरी तरह कानून के दायरे में काम कर रही है और किसी भी अवैध गतिविधि या अपराध रोकने के लिए केवल सरकार के अनुरोध पर ही डेटा साझा किया जाएगा।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस डेटा का उपयोग किसी निजी या तीसरे पक्ष को नहीं दिया जाएगा।

डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड की अनुपस्थिति भी उठा मुद्दा

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन अधिनियम के तहत बनाए गए डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड ऑफ इंडिया में अभी तक नियुक्तियां नहीं हुई हैं। इसी कारण उपयोगकर्ताओं के पास शिकायत दर्ज कराने का प्रभावी मंच उपलब्ध नहीं है, और मामला सीधे कोर्ट में लाना पड़ा।

कोर्ट ने मांगा लिखित जवाब

हाईकोर्ट ने मेटा से इस पूरे मामले में छह सप्ताह के भीतर विस्तृत लिखित जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। अब अगली सुनवाई में यह तय होगा कि इंस्टाग्राम की यह नीति निजता के अधिकार का उल्लंघन करती है या नहीं।

यह मामला डिजिटल युग में निजता और सुरक्षा के बीच संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी बहस के रूप में देखा जा रहा है।

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