भोपाल/कटनी से जुड़े मदरसा मामले में अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी हस्तक्षेप किया है। 165 बच्चों के रेस्क्यू के इस मामले ने राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा छेड़ दी है, जिसमें बच्चों के शिक्षा के अधिकार और धार्मिक शिक्षा के बीच संतुलन को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
एनएचआरसी सदस्य प्रियंक कानूनगो ने इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि बच्चों को उनके घरों से दूर ले जाकर गैर-शैक्षणिक गतिविधियों में शामिल करना शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून के अनुसार हर बच्चे को अपने घर के आसपास स्थित स्कूल में पढ़ने का अधिकार है और उसे इससे वंचित नहीं किया जा सकता।

कटनी रेलवे स्टेशन पर हाल ही में पटना-पुणे एक्सप्रेस से 165 बच्चों को रेस्क्यू किया गया था। ये बच्चे बिहार से महाराष्ट्र ले जाए जा रहे थे। इस घटना के बाद यह सवाल उठने लगा कि क्या बच्चों को औपचारिक शिक्षा से दूर रखा जा रहा था। कानूनगो के मुताबिक, शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुए 15 साल हो चुके हैं, ऐसे में इस तरह की घटनाएं चिंताजनक हैं।
उन्होंने कहा कि मदरसों में धार्मिक शिक्षा दी जा सकती है, लेकिन यदि इसके कारण बच्चों की नियमित स्कूली पढ़ाई प्रभावित होती है, तो यह उनके मौलिक अधिकारों का हनन माना जाएगा। उनका जोर इस बात पर रहा कि शिक्षा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि औपचारिक और समग्र होनी चाहिए, जिससे बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो सके।
इस पूरे मामले के बीच मक्का-मदीना में स्थित “रुबात” संपत्तियों को लेकर भी विवाद सामने आया है। प्रियंक कानूनगो ने इन संपत्तियों को “शाही” बताए जाने पर आपत्ति जताते हुए कहा कि ये किसी नवाब या खास परिवार की निजी संपत्ति नहीं हैं, बल्कि आम लोगों के दान और योगदान से निर्मित हुई हैं।

उन्होंने तीखा आरोप लगाते हुए कहा कि भोपाल के आम लोगों से जुटाए गए धन से इन रुबातों का निर्माण किया गया था, इसलिए इन्हें शाही बताना भ्रामक है। उनके अनुसार, इनका उद्देश्य आम हाजियों को ठहरने की सुविधा देना था, न कि किसी विशेष वर्ग के लिए आरक्षित करना।
कानूनगो ने रुबात संपत्तियों के प्रबंधन पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि उचित देखरेख के अभाव में मदीना की रुबात पिछले 6 वर्षों से बंद पड़ी है, जबकि मक्का में भी हाजियों के ठहरने पर पाबंदियां लगाई जा रही हैं।
इस मामले को गंभीर मानते हुए उन्होंने विदेश मंत्रालय, अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय और मध्य प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
दूसरी ओर, ऑल तंजीम को-ऑर्डिनेशन कमेटी का दावा है कि रुबात सुविधाएं बंद होने के कारण हाजियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ गया है। बताया गया कि भोपाल, सीहोर और रायसेन के करीब 1000 हाजियों को इस साल करीब 4 करोड़ रुपए अतिरिक्त खर्च करने पड़ सकते हैं।
मक्का में प्रति व्यक्ति करीब 75 हजार रुपए और मदीना में करीब 25 हजार रुपए अतिरिक्त खर्च का अनुमान लगाया गया है।

इस पूरे घटनाक्रम पर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई है। आरिफ मसूद ने प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब जांच में कोई गंभीर गड़बड़ी नहीं मिली, तो बच्चों को 12 दिनों तक क्यों रोका गया। उन्होंने इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
कटनी मदरसा प्रकरण अब केवल एक स्थानीय घटना नहीं रह गया है, बल्कि यह बच्चों के अधिकार, शिक्षा व्यवस्था, धार्मिक संस्थानों की भूमिका और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे बड़े मुद्दों को सामने ला रहा है।
अब नजर इस बात पर टिकी है कि जांच के बाद क्या निष्कर्ष निकलता है और क्या इस मामले में बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाते हैं।