दतिया की पीएचडी छात्रा ने सिस्टम से हारकर दी जान: 9 दिन तक न्याय की गुहार, मौत के बाद दर्ज हुई FIR !

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दतिया की 24 वर्षीय एक होनहार पीएचडी छात्रा ने आखिरकार सिस्टम की बेरुखी और पुलिस की कथित संवेदनहीनता से तंग आकर आत्महत्या कर ली। जीवाजी यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रही छात्रा ने शुक्रवार शाम गोराघाट थाना क्षेत्र स्थित अपने घर में फांसी लगाकर जान दे दी। इस घटना ने पूरे प्रदेश में पुलिस व्यवस्था और महिलाओं को न्याय दिलाने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मृतका के पास से मिले सुसाइड नोट में उसने अपनी मौत के लिए कथित दुष्कर्म आरोपी योगेश रावत और उसकी दो बहनों को जिम्मेदार ठहराया है। छात्रा ने आरोप लगाया था कि उसके साथ ग्वालियर के होटल में नशीला पदार्थ पिलाकर दुष्कर्म किया गया था, जिसके बाद वह गर्भवती हो गई थी। इसके बावजूद उसे समय पर न्याय नहीं मिला।

9 दिन तक थाने और अफसरों के चक्कर

जानकारी के अनुसार छात्रा पिछले नौ दिनों में पांच बार पड़ाव थाना और पुलिस अधीक्षक कार्यालय के चक्कर लगाती रही। आरोप है कि हर बार उसे घंटों थाने में बैठाकर रखा गया, लेकिन FIR दर्ज नहीं की गई।

परिजनों और सूत्रों के मुताबिक छात्रा मानसिक रूप से लगातार टूटती जा रही थी। उसने पुलिस अधिकारियों को पूरी घटना बताई थी और आरोपी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी, लेकिन मामला दर्ज करने में टालमटोल की जाती रही।

आरोप है कि थाना प्रभारी शैलेंद्र भार्गव बार-बार यही कहते रहे कि “पहले आरोपी पकड़ेंगे, फिर FIR होगी।” जबकि कानून के जानकारों का कहना है कि दुष्कर्म जैसे मामलों में पहले FIR दर्ज करना अनिवार्य होता है और उसके बाद जांच एवं गिरफ्तारी की प्रक्रिया शुरू की जाती है।

एसपी के निर्देश के बाद भी कार्रवाई नहीं

बताया जा रहा है कि मामले में वरिष्ठ अधिकारियों तक शिकायत पहुंची थी और पुलिस अधीक्षक स्तर से भी कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे, लेकिन इसके बावजूद थाना स्तर पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

छात्रा लगातार मानसिक दबाव, सामाजिक बदनामी और न्याय न मिलने की पीड़ा से गुजर रही थी। परिजनों के अनुसार अस्पताल से घर लौटने के बाद वह काफी परेशान रहने लगी थी। आखिरकार शुक्रवार शाम उसने अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।

मौत के बाद दर्ज हुई दुष्कर्म की FIR

सबसे बड़ा सवाल इस बात को लेकर उठ रहा है कि जिस मामले में नौ दिनों तक FIR दर्ज नहीं की गई, उसी मामले में छात्रा की मौत के कुछ घंटों बाद पुलिस ने तेजी दिखाते हुए दुष्कर्म का मामला दर्ज कर लिया।

शुक्रवार शाम करीब 6 बजे छात्रा ने आत्महत्या की। इसके बाद रात 11:55 बजे पड़ाव थाना पुलिस ने आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म का मामला दर्ज किया।

इस घटना के बाद पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर लोगों में भारी नाराजगी है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते शिकायत पर कार्रवाई की जाती तो शायद छात्रा की जान बच सकती थी।

मौत के बाद मेडिकल के लिए बुलाया

मामले में पुलिस की कथित लापरवाही का एक और चौंकाने वाला पहलू शनिवार सुबह सामने आया। उस समय छात्रा का शव दतिया के पोस्टमार्टम हाउस में रखा हुआ था, लेकिन इसी दौरान पड़ाव थाने की जेएसआई पूनम भदौरिया ने मृतका के भाई को फोन कर कहा कि पीड़िता को मेडिकल के लिए थाने लेकर आओ।

इस पर भाई ने रोते हुए जवाब दिया कि अब वह अपनी बहन को जिंदा नहीं, बल्कि उसकी लाश ही लेकर आ सकता है। यह घटना सामने आने के बाद सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर पुलिस की संवेदनशीलता को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं।

पुलिस परिवार से होने के बावजूद नहीं मिला न्याय

इस पूरे मामले ने इसलिए भी लोगों को झकझोर दिया क्योंकि मृतका का सगा भाई खुद ग्वालियर पुलिस में आरक्षक है, जबकि उसका जीजा भी दतिया जिले में आरक्षक पद पर पदस्थ है।

इसके बावजूद छात्रा और उसका परिवार न्याय के लिए लगातार थानों और अधिकारियों के चक्कर काटता रहा। परिवार का आरोप है कि पुलिस विभाग से जुड़े होने के बावजूद उन्हें सुनवाई नहीं मिली, तो आम लोगों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।

सुसाइड नोट बना जांच का अहम आधार

पुलिस को मौके से एक सुसाइड नोट भी मिला है, जिसमें छात्रा ने आरोपी और उसकी दो बहनों के नाम लिखे हैं। पुलिस अब उसी आधार पर मामले की जांच कर रही है।

मध्य प्रदेश पुलिस के अधिकारियों का कहना है कि पूरे मामले की जांच की जा रही है। यदि किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है।

कानून और संवेदनशीलता पर उठे सवाल

इस घटना ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि महिलाओं से जुड़े गंभीर अपराधों में पुलिस की शुरुआती प्रतिक्रिया कितनी महत्वपूर्ण होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि दुष्कर्म जैसे मामलों में पीड़िता को तत्काल कानूनी सहायता, सुरक्षा और मानसिक सहयोग मिलना चाहिए।

यदि शिकायत को गंभीरता से न लिया जाए और पीड़िता को लगातार थाने के चक्कर लगाने पड़ें, तो वह मानसिक रूप से पूरी तरह टूट सकती है। दतिया की यह घटना इसी दर्दनाक सच्चाई को सामने लाती है।

यह मामला अब सिर्फ एक आत्महत्या का नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था, पुलिस संवेदनशीलता और महिलाओं की सुरक्षा पर बड़ा सवाल बन गया है।

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