मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में आयोजित ग्रीन बिल्डिंग वर्कशॉप में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने नगर नियोजन को लेकर एक अहम दृष्टिकोण सामने रखा। उन्होंने कहा कि आधुनिक विकास की दौड़ में प्राचीन भारतीय विज्ञान और स्थापत्य को नजरअंदाज करना बड़ी भूल होगी। अगर शहरों के विकास में पुराने ज्ञान और तकनीकों का समावेश किया जाए, तो कम लागत में बेहतर, टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि पुराने समय में बनाए गए भवन और नगर संरचनाएं जलवायु के अनुरूप होती थीं, जिससे गर्मी से प्राकृतिक रूप से बचाव होता था। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज जब तापमान लगातार बढ़ रहा है और जलवायु परिवर्तन गंभीर चुनौती बन चुका है, तब हमें अपने पारंपरिक ज्ञान से सीख लेकर आगे बढ़ना होगा। इससे न केवल ऊर्जा की बचत होगी, बल्कि आम लोगों को भी राहत मिलेगी।
प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का संगम
सीएम ने उदाहरण देते हुए बताया कि भारत में कालगणना और खगोलीय अध्ययन की परंपरा सदियों पुरानी है। उन्होंने महाकालेश्वर मंदिर का जिक्र करते हुए कहा कि यहां से जुड़े खगोलीय बिंदु समय के साथ बदल चुके हैं, जिसके चलते अब लगभग 32 किलोमीटर दूर वेधशाला स्थापित की गई है। यह दर्शाता है कि प्राचीन समय में भी वैज्ञानिक सोच और सटीक गणना का महत्व था।
उन्होंने मांडव और राजा भोज के समय के जल प्रबंधन कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि उस दौर में बनाए गए सिस्टम आज भी प्रेरणा दे सकते हैं। भोपाल में तालाबों और जल संरचनाओं का नेटवर्क इसका उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसे आज के शहरी विकास में फिर से अपनाने की जरूरत है।

ग्लोबल वार्मिंग का सबसे ज्यादा असर किसानों पर
मुख्यमंत्री ने ग्लोबल वार्मिंग को लेकर चिंता जताई और कहा कि इसके सबसे गंभीर दुष्प्रभाव किसानों पर पड़ रहे हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि आंधी-तूफान और असमय बारिश के कारण आम के पेड़ों से फल झड़ जाते हैं, जिससे किसानों की सालभर की मेहनत बर्बाद हो जाती है।
उन्होंने कहा कि एक किसान पूरे साल मेहनत करता है और जब फसल तैयार होती है, तब मौसम की मार उसे भारी नुकसान पहुंचा देती है। ऐसे में जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिए ठोस कदम उठाना बेहद जरूरी है।
बढ़ती एसी की मांग से ऊर्जा संकट का खतरा
कार्यक्रम में लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह ने भी महत्वपूर्ण बातें रखीं। उन्होंने कहा कि आज हर घर और कार्यालय में एयर कंडीशनर की मांग तेजी से बढ़ रही है। यह ट्रेंड गांवों तक भी पहुंच रहा है, जिससे आने वाले समय में ऊर्जा संकट गहरा सकता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि इस समस्या का समाधान केवल ग्रीन बिल्डिंग कॉन्सेप्ट में ही छिपा है। यदि भवनों का निर्माण इस तरह किया जाए कि उनमें प्राकृतिक रोशनी और वेंटिलेशन बेहतर हो, तो एसी की जरूरत काफी हद तक कम की जा सकती है।
ग्रीन बिल्डिंग और नई तकनीकों पर जोर
वर्कशॉप में ग्रीन बिल्डिंग के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई। इसमें ऊर्जा दक्षता, प्राकृतिक प्रकाश, वेंटिलेशन, वेस्ट मैनेजमेंट और स्मार्ट टेक्नोलॉजी जैसे विषय शामिल रहे। इसके अलावा 3D प्रिंटिंग से बनने वाले भवनों पर भी विचार किया गया, जो भविष्य में निर्माण क्षेत्र में क्रांति ला सकते हैं।
सरकार का लक्ष्य है कि आने वाले समय में अधिक से अधिक भवन “ग्रीन सर्टिफाइड” हों, जिससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ लोगों को बेहतर जीवन स्तर मिल सके।
ग्राउंड वाटर रिचार्ज और रेन वाटर हार्वेस्टिंग पर फोकस
लोक निर्माण विभाग द्वारा भूजल स्तर सुधारने के लिए भी कई कदम उठाए जा रहे हैं। इसके तहत ग्राउंड वाटर रिचार्ज के लिए विशेष बोर्ड का गठन किया गया है। साथ ही, सभी एलिवेटेड कॉरिडोर और फ्लाईओवर पर रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को अनिवार्य किया जा रहा है।
इस पहल का उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों के लिए जल संसाधनों को सुरक्षित रखना है। मंत्री ने कहा कि इंजीनियर अब वैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए योजनाएं तैयार करेंगे।
कुल मिलाकर, यह स्पष्ट है कि मध्यप्रदेश सरकार अब विकास के पारंपरिक और आधुनिक दोनों पहलुओं को जोड़कर आगे बढ़ना चाहती है। मोहन यादव का यह दृष्टिकोण दिखाता है कि यदि प्राचीन ज्ञान और आधुनिक तकनीक का सही संतुलन बनाया जाए, तो न केवल पर्यावरण की रक्षा की जा सकती है, बल्कि आम जनता को भी बेहतर और टिकाऊ जीवनशैली उपलब्ध कराई जा सकती है।