भोपाल: एफआईआर और विवेचना में गड़बड़ी पर सीआईडी सख्त, सभी एसपी-सीपी को जारी किए सख्त निर्देश !

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मध्यप्रदेश में पुलिस द्वारा दर्ज की जा रही एफआईआर और मामलों की विवेचना को लेकर गंभीर सवाल उठने के बाद अब अपराध अनुसंधान विभाग (सीआईडी) ने सख्त रुख अपनाया है। राज्य के विभिन्न थानों में विशेष अधिनियमों (स्पेशल एक्ट) के प्रावधानों की गलत व्याख्या किए जाने की शिकायतें सामने आने के बाद पुलिस मुख्यालय ने सभी पुलिस आयुक्तों और पुलिस अधीक्षकों को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि वे कानून के प्रावधानों का सही तरीके से पालन सुनिश्चित करें।

दरअसल, हाल ही में समीक्षा के दौरान यह पाया गया कि कई मामलों में पुलिस ने विशेष अधिनियमों के तहत आने वाले अपराधों को गलत तरीके से दर्ज किया। कुछ मामलों में इन्हें “असंज्ञेय” मान लिया गया, जबकि कई मामलों में भारतीय न्याय संहिता के तहत संज्ञेय अपराधों के साथ जोड़कर एफआईआर दर्ज कर दी गई। इस तरह की प्रक्रिया से न केवल केस की कानूनी स्थिति कमजोर होती है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया भी प्रभावित होती है।

इसी गंभीरता को देखते हुए पुलिस मुख्यालय के स्पेशल डीजी (सीआईडी) ने विस्तृत सर्कुलर जारी किया है। इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसी भी मामले में संबंधित विशेष अधिनियम की प्रक्रिया को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि किसी विशेष कानून में अपराध दर्ज करने, जांच करने या अभियोजन चलाने की अलग प्रक्रिया निर्धारित है, तो पुलिस को उसी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य होगा।

सर्कुलर में यह भी उल्लेख किया गया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के प्रावधानों का उपयोग तभी किया जाएगा, जब संबंधित विशेष अधिनियम में अलग से कोई प्रक्रिया निर्धारित न हो। यानी सामान्य कानूनों का सहारा केवल तभी लिया जा सकता है, जब विशेष कानून इस विषय में मौन हो।

पुलिस मुख्यालय ने यह भी निर्देश दिए हैं कि सभी अधिकारी—चाहे वे पुलिस आयुक्त हों, जिला पुलिस अधीक्षक, रेल पुलिस, एसटीएफ या साइबर इकाइयों से जुड़े अधिकारी—उन्हें विशेष अधिनियमों का गहराई से अध्ययन करना चाहिए। बिना पूरी समझ के की गई कार्रवाई से न केवल केस कमजोर पड़ता है, बल्कि आरोपी को लाभ मिलने की संभावना भी बढ़ जाती है।

सर्कुलर में कई महत्वपूर्ण अधिनियमों का उदाहरण देकर स्पष्ट किया गया है कि किन मामलों में किस प्रकार की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। जैसे कि ‘दिव्यांग अधिकार अधिनियम 2016’ के तहत पीड़ित को कार्यपालिक मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन करने का अधिकार है और पुलिस को उसे आवश्यक जानकारी और सहायता उपलब्ध कराना अनिवार्य है। इसी तरह ‘घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम 2005’ के अंतर्गत पीड़िता को संरक्षण अधिकारियों, सेवा प्रदाताओं और विधिक सहायता के बारे में जानकारी देना पुलिस की जिम्मेदारी है।

वहीं ‘मध्यप्रदेश सहकारी समितियां अधिनियम 1960’ के तहत बिना सक्षम प्राधिकारी की लिखित अनुमति के कोई भी संज्ञान नहीं लिया जा सकता। ‘केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम 2017’ में भी स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित है, जिसका पालन करना आवश्यक है। इसी प्रकार ‘खाद्य एवं औषधि नियंत्रण अधिनियम 1957’ में अभियोजन के लिए अधिकृत अधिकारी द्वारा न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना अनिवार्य बताया गया है।

इसके अलावा ‘पीएमएलए एक्ट 2002’, ‘पासपोर्ट अधिनियम 1967’, ‘मध्यप्रदेश श्रम कल्याण निधि अधिनियम 2006’ और ‘मध्यप्रदेश देनदार संरक्षण अधिनियम 1937’ जैसे कानूनों के मामलों में भी निर्धारित प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि पुलिस द्वारा की जाने वाली छोटी-छोटी कानूनी चूकें बड़े मामलों को भी कमजोर कर देती हैं। अदालतों में ऐसे मामलों में आरोपी को संदेह का लाभ मिल जाता है, जिससे न्याय प्रभावित होता है। यही वजह है कि सीआईडी ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए पूरे प्रदेश में एकरूपता और पारदर्शिता लाने की पहल की है।

इस निर्देश का उद्देश्य केवल गलतियों को सुधारना ही नहीं, बल्कि भविष्य में ऐसी त्रुटियों को रोकना भी है। पुलिस मुख्यालय चाहता है कि हर स्तर पर कानून का सही अनुपालन हो, ताकि पीड़ितों को न्याय मिल सके और दोषियों को सजा दिलाने में कोई कानूनी बाधा न आए।

कुल मिलाकर, यह कदम मध्यप्रदेश में पुलिस व्यवस्था को और अधिक मजबूत, पारदर्शी और कानूनसम्मत बनाने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है। यदि इन निर्देशों का सही तरीके से पालन किया गया, तो निश्चित ही न्यायिक प्रक्रिया में सुधार देखने को मिलेगा और आम जनता का भरोसा भी पुलिस पर बढ़ेगा।

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