सागर। मदर्स-डे के अवसर पर मां के प्रेम, त्याग और साहस की एक ऐसी भावुक कर देने वाली कहानी सामने आई है, जिसने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया। शाहगढ़ की रहने वाली 40 वर्षीय कंचन असाटी पिछले करीब 10 वर्षों से गंभीर किडनी बीमारी से जूझ रही थीं। जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रही बेटी को बचाने के लिए आखिरकार उनकी 75 वर्षीय मां मनोरमा असाटी आगे आईं और अपनी किडनी दान कर बेटी को नया जीवन दे दिया।
यह सफल किडनी ट्रांसप्लांट जून 2025 में बंसल अस्पताल में किया गया। उम्र अधिक होने के कारण डॉक्टरों ने शुरुआत में ऑपरेशन को जोखिम भरा बताया था, लेकिन मां की दृढ़ इच्छा शक्ति और डॉक्टरों की मेहनत से ऑपरेशन सफल रहा। वर्तमान में मां और बेटी दोनों स्वस्थ हैं और सामान्य जीवन जी रही हैं।
जानकारी के अनुसार, कंचन असाटी को करीब 10 साल पहले गर्भावस्था के दौरान गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं शुरू हुई थीं। प्रसव के बाद जब उनकी जांच कराई गई, तब डॉक्टरों ने बताया कि उनकी किडनियां ठीक तरीके से काम नहीं कर रही हैं। इसके बाद उनका लंबे समय तक इलाज चला।

समय बीतने के साथ उनकी स्थिति और बिगड़ती गई। शरीर में क्रिएटिनिन और यूरिया का स्तर लगातार बढ़ने लगा, जिससे उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। परिवार ने इलाज के लिए दिल्ली, हरियाणा, इंदौर और अहमदाबाद सहित कई बड़े निजी अस्पतालों का सहारा लिया, लेकिन कोई स्थायी राहत नहीं मिली। आखिर में डॉक्टरों ने साफ कर दिया कि अब किडनी ट्रांसप्लांट ही उनकी जान बचाने का एकमात्र रास्ता है।
इसके बाद परिवार ने डोनर की तलाश शुरू की। परिवार और रिश्तेदारों सहित करीब 10 लोगों की मेडिकल जांच कराई गई, लेकिन किसी की भी किडनी कंचन से मैच नहीं हुई। परिवार धीरे-धीरे निराश होने लगा था। ऐसे कठिन समय में दमोह निवासी उनकी 75 वर्षीय मां मनोरमा असाटी उम्मीद बनकर सामने आईं।
जब मनोरमा असाटी की जांच हुई तो उनकी किडनी बेटी से मैच कर गई। हालांकि, डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनकी उम्र थी। 75 साल की उम्र में किडनी डोनेट करना और ट्रांसप्लांट सर्जरी करवाना बेहद जोखिम भरा माना जाता है। डॉक्टरों ने शुरुआत में ऑपरेशन से इनकार भी कर दिया था, लेकिन मां की जिद और बेटी को बचाने की इच्छा के आगे सभी को झुकना पड़ा।
बीमारी के इस लंबे संघर्ष के बीच कंचन को एक और बड़ा सदमा तब लगा, जब वर्ष 2024 में उनके पति अमित आनंद असाटी का हृदय गति रुकने से निधन हो गया। पति की मौत के बाद कंचन अपने दो बेटों 19 वर्षीय कौस्तुभ और 11 वर्षीय कौटिल्य के साथ अकेली पड़ गई थीं। उस समय उनकी जिंदगी पूरी तरह डायलिसिस पर निर्भर हो चुकी थी।
हर दिन बेटी को दर्द और कमजोरी से जूझते देख मां मनोरमा असाटी का दिल टूट जाता था। उन्होंने परिवार से साफ कहा कि यदि उनकी किडनी से बेटी की जान बच सकती है, तो वह हर जोखिम उठाने को तैयार हैं। मां के इस निर्णय ने पूरे परिवार को भावुक कर दिया।

इसके बाद जून 2025 में भोपाल के बंसल अस्पताल में डॉक्टरों की टीम ने सावधानीपूर्वक ऑपरेशन की तैयारी की। लंबे मेडिकल परीक्षण और निगरानी के बाद किडनी ट्रांसप्लांट किया गया। आखिरकार ऑपरेशन सफल रहा और कंचन को नया जीवन मिल गया।
इस मामले को डॉक्टर भी बेहद प्रेरणादायक बता रहे हैं। डॉ. अजित आनंद असाटी ने कहा कि यह सिर्फ एक मेडिकल ऑपरेशन नहीं, बल्कि मां के प्रेम, त्याग और साहस की सबसे बड़ी मिसाल है। उन्होंने कहा कि इतनी अधिक उम्र में अंगदान करना बेहद दुर्लभ है और यह साबित करता है कि मां अपने बच्चों के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।
मदर्स-डे पर सामने आई यह कहानी समाज को एक बड़ा संदेश देती है कि मां का प्यार दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है। मां अपने बच्चों की खुशी और जीवन के लिए हर दर्द और हर कठिनाई सहने को तैयार रहती है।
आज कंचन असाटी स्वस्थ जीवन जी रही हैं और अपनी मां को अपनी नई जिंदगी का सबसे बड़ा आधार मानती हैं। वहीं, मनोरमा असाटी भी पूरी तरह स्वस्थ हैं और दमोह में परिवार के साथ रह रही हैं। यह कहानी केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि उस अटूट ममता की मिसाल है, जो हर परिस्थिति में अपने बच्चों की रक्षा करती है।