योग निकेतन संस्थान, सागर में एक गरिमामय आयोजन के दौरान ‘विजय पथ’ पत्रिका के पच्चीसवें विशेषांक का लोकार्पण स्वामी ध्यानेश्वर सरस्वती योगाचार्य विष्णु आर्य ने किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि ‘विजय पथ’ के माध्यम से भारतीय सेना के पराक्रम, शौर्य और बलिदान का स्मरण कराना ही नहीं बल्कि समाज में राष्ट्रप्रेम और कर्तव्यनिष्ठा का संचार करना इसका वास्तविक उद्देश्य है।
योगाचार्य विष्णु आर्य ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि डॉ. ललित मोहन द्वारा रचित ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और सेना के सम्मान में लिखे गए वीर रस प्रधान गीत निःशुल्क वितरित किए जा रहे हैं, जो जन-जन में देशभक्ति की भावना को प्रज्वलित कर रहे हैं। उन्होंने कहा – “हमने बचपन से डॉ. ललित मोहन जी को समाजसेवा और सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय देखा है। विश्वविद्यालय, आकाशवाणी और अन्य क्षेत्रों में इनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। इनका कार्य समाज के लिए प्रेरणास्रोत है।”

सम्मान समारोह
आयोजन के दौरान ‘विजय पथ’ के पच्चीसवें विशेषांक में योगदान देने वाले कई सहयोगियों को सम्मानित किया गया। इनमें रेखाचित्र आर्टिस्ट डॉ. अर्चना द्विवेदी, प्रकाशन सहयोगी शिवकुमार भीमसरिया, मुद्रण सहयोगी रूपेश विश्वकर्मा, समन्वयक मनोज दुबे और मुख्य रचनाकार डॉ. ललित मोहन शामिल रहे। सभी का शॉल एवं प्रतीक चिन्ह भेंट कर अभिनंदन किया गया।
राष्ट्रीय स्तर पर सराहना
‘विजय पथ’ के गीतों ने केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी गहरी छाप छोड़ी है। भारत के रक्षा मंत्री माननीय राजनाथ सिंह सहित देश के अनेक विशिष्ट व्यक्तित्वों ने पत्रिका की सराहना करते हुए शुभकामनाएँ और बधाई प्रेषित की हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि सागर से निकली यह रचनात्मक धारा अब राष्ट्रीय परिदृश्य पर देशभक्ति की अलख जगा रही है।

आयोजन का संदेश
कार्यक्रम के समापन अवसर पर योगाचार्य विष्णु आर्य ने कहा कि राष्ट्र और समाज को मजबूत करने के लिए साहित्य, संगीत और कला की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। ‘विजय पथ’ जैसे प्रकाशन समाज में देशभक्ति और नैतिक मूल्यों के बीज बोने का कार्य कर रहे हैं। आने वाली पीढ़ियाँ जब इन गीतों को सुनेंगी और पढ़ेंगी तो उन्हें भारतीय सेना के बलिदान और गौरवपूर्ण इतिहास का बोध होगा।
इस गरिमामय आयोजन में योग निकेतन संस्थान का पूरा परिवार, स्थानीय साहित्यकार, कला एवं संस्कृति प्रेमी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे और ‘विजय पथ’ के पच्चीसवें विशेषांक को ऐतिहासिक महत्व का माना।