इंदौर, मध्यप्रदेश।
सरकार चाहे जितनी डिजिटल घोषणाएँ कर ले, इंदौर आरटीओ दफ्तर में वक्त अब भी वही चलता है जो दलाल की जेब में रखी घड़ी बताती है। दावा है कि “सब कुछ ऑनलाइन”… मगर हकीकत यह कि काम तभी ऑनलाइन होता है जब पैसे ऑफलाइन घूम चुके हों। यहाँ फाइल नहीं चलती, दलाल चलता है… और उसके पीछे पूरा ऑफिस।

जाँच में खुला पूरा ‘ऑपरेशन आरटीओ’
जैसे ही टीम ने चुपचाप दफ्तर की नब्ज टटोली, दलालों ने खुले में स्वीकार किया:
“ऑनलाइन वॉनलाइन कुछ नहीं होता। बिना हमारे फाइल आगे नहीं जाती। पैसा सीधा ऊपर जाता है।”
वाहन बेचने के बाद मालिक को आरटीओ न आना पड़े, इसके नाम पर 8 हजार रुपए तक वसूले जाते हैं।
साफ सौदा: “सिस्टम नहीं चलता, सिस्टम चलाया जाता है।”
कानून कहता तीन दिन, सिस्टम कहता पहले दलाल
नियम: 72 घंटे में नामांतरण।
हकीकत: फाइल तब तक धूल खाती है, जब तक कोई एजेंट आकर बाबू की कलम को न जगाए।
नाम छिपाने की शर्त पर एक एजेंट ने बताया:
“हिस्सेदारी बिना यहाँ स्याही भी नहीं बहती।”
इस पूरे नेटवर्क के आडियो व वीडियो सबूत मौजूद हैं।
रियलिटी चेक: सिस्टम फिजिकल, दलाल डिजिटल
टीम ने खुद ऑनलाइन नामांतरण की प्रक्रिया की।
आवेदन स्क्रीन पर ऐसे अटक गया जैसे इंटरनेट नहीं, नीयत क्रैश हो गई हो।
लेकिन जैसे ही दलाल को पैसे दिए गए…
कुछ घंटों में RC अपलोड!
सबूत साफ: सिस्टम नहीं, दलाल-ड्रिवन नेटवर्क चालू है।
अब सवाल परिवहन विभाग और प्रशासन से
जब दावा है कि सब कुछ क्लिक पर होता है,
तो फिर यह “कमीशन पर क्लिक सिस्टम” क्यों?
✅ क्या विभाग भ्रष्ट स्टाफ पर कार्रवाई करेगा?
✅ क्या दलालों के नेटवर्क पर नकेल कसेगी?
✅ या फिर “जाँच जारी है” का पुराना डायलॉग चलेगा?
अगला कदम
इस खुलासे का अगला चरण जल्द सार्वजनिक होगा,
जहाँ उन चेहरों के नाम सामने आएंगे जो सरकारी मेज़ के पीछे
फाइल नहीं, भ्रष्टाचार का ठेका चला रहे हैं।
यह कहानी खत्म नहीं…
यह तो “ऑपरेशन आरटीओ” का पहला पेज है।
फाइलें अब बंद नहीं होंगी, चेहरे बेनकाब होंगे।