खजुराहो से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित कर्री गांव में मकर संक्रांति के पावन अवसर पर दो दिवसीय पारंपरिक मेले की शुरुआत हो गई है। यह मेला 15 जनवरी से 16 जनवरी तक आयोजित किया जा रहा है, जिसमें आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में ग्रामीण श्रद्धा और उत्साह के साथ शामिल हो रहे हैं।
ग्रामीणों के अनुसार, कर्री मेले की परंपरा सौ वर्षों से भी अधिक पुरानी है। इसकी शुरुआत ब्रिटिश शासनकाल के दौरान हुई थी। समय के साथ मेले के स्वरूप में भले ही बदलाव आए हों, लेकिन इसकी रौनक, परंपरा और लोगों की आस्था आज भी उसी तरह कायम है।

प्राचीन शिव मंदिर आस्था का केंद्र
ग्रामीणों का कहना है कि कभी इस क्षेत्र में स्थानीय राजा का किला हुआ करता था, जिसके अवशेष अब दिखाई नहीं देते। हालांकि, उसी स्थल के समीप स्थित प्राचीन शिव मंदिर कर्री आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। मेले के दौरान दूर-दराज के गांवों से लोग यहां दर्शन करने पहुंचते हैं और साथ ही मेले में खरीदारी का आनंद लेते हैं।

पारंपरिक मिष्ठान और ग्रामीण संस्कृति की झलक
मेले में पारंपरिक तरीके से तैयार किए गए मिष्ठान, खिलौने, घरेलू उपयोग की वस्तुएं और ग्रामीण हस्तशिल्प की दुकानों पर लोगों की भीड़ देखने को मिल रही है। मकर संक्रांति के अवसर पर तिल और गुड़ से बने व्यंजनों की विशेष मांग रही।

व्यापार पर दिखा आर्थिक असर
दुकानदारों का कहना है कि मेले में इस बार भीड़ तो अच्छी है, लेकिन बिक्री पिछले वर्षों की तुलना में कम रही है। उनका कहना है कि क्षेत्र में किसानों की फसल प्रभावित होने के कारण लोगों की क्रय शक्ति घटी है, जिसका सीधा असर व्यापार पर पड़ा है। इसके बावजूद दुकानदारों का मानना है कि कर्री मेला केवल व्यापार का माध्यम नहीं, बल्कि परंपरा से जुड़ा एक सांस्कृतिक आयोजन है।
सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद
मेले को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए प्रशासन द्वारा पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम किए गए हैं। अधिकारियों के अनुसार, पुलिस बल तैनात किया गया है और आयोजन पर लगातार नजर रखी जा रही है। ग्रामीणों का भी प्रशासन को पूरा सहयोग मिल रहा है।
कुल मिलाकर, मकर संक्रांति पर कर्री गांव में सजा यह पारंपरिक मेला आज भी गांव की पहचान, सांस्कृतिक विरासत और सामूहिक आस्था का जीवंत उदाहरण बना हुआ है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों को एक सूत्र में बांधने का काम कर रहा है।