प्रयागराज में आयोजित हनुमंत कथा के दौरान धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने एक निजी कंपनी की कथित ड्रेस कोड नीति को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी। यह विवाद लेंसकार्ट कंपनी से जुड़ा है, जिस पर आरोप लगाया गया कि उसने अपने कर्मचारियों को तिलक, सिंदूर और मंगलसूत्र जैसे धार्मिक प्रतीक पहनने से रोकने की बात कही है।
यह मामला सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक कथित दस्तावेज से शुरू हुआ, जिसमें दावा किया गया कि कंपनी ने अपने कर्मचारियों के लिए कुछ धार्मिक प्रतीकों पर प्रतिबंध लगाया है। इस दस्तावेज के अनुसार, कर्मचारियों को बिंदी, तिलक और कलावा पहनने से रोका गया, जबकि हिजाब और पगड़ी को कुछ शर्तों के साथ अनुमति दी गई। इसी कथित भेदभाव को लेकर विवाद ने तूल पकड़ लिया और विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों ने इस पर नाराजगी जताई।

हनुमंत कथा के पहले दिन, जो 21 से 23 अप्रैल तक आयोजित की जा रही है, धीरेंद्र शास्त्री ने इस मुद्दे पर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने कथित पाबंदियों को लेकर कड़ा विरोध जताते हुए कहा कि भारत में धार्मिक प्रतीकों का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने अपने भाषण में तीखे शब्दों का प्रयोग करते हुए कंपनी को चेतावनी दी और कहा कि यदि किसी को भारत की संस्कृति और धार्मिक प्रतीकों से समस्या है, तो उसे यहां व्यवसाय करने पर पुनर्विचार करना चाहिए।
धीरेंद्र शास्त्री ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि आज यदि तिलक और मंगलसूत्र जैसे प्रतीकों पर सवाल उठाए जा रहे हैं, तो भविष्य में अन्य धार्मिक परंपराओं और ग्रंथों पर भी सवाल खड़े किए जा सकते हैं। उन्होंने लोगों से एकजुट रहने और अपनी सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करने का आह्वान किया। उन्होंने संगम का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे विभिन्न नदियां मिलकर एक शक्तिशाली संगम बनाती हैं, वैसे ही समाज को भी एकजुट रहना चाहिए।
इस विवाद को और बढ़ावा तब मिला जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कुछ एक्टिविस्ट्स ने इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने सवाल किया कि यदि कुछ धार्मिक प्रतीकों को अनुमति दी जा सकती है, तो अन्य प्रतीकों पर रोक क्यों लगाई जा रही है। इसके बाद कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिले, जहां लोगों ने कंपनी के शोरूम के बाहर विरोध जताया और धार्मिक प्रतीकों के समर्थन में आवाज उठाई।
विवाद बढ़ने के बाद कंपनी की ओर से सफाई भी सामने आई। पीयूष बंसल ने स्पष्ट किया कि कंपनी सभी धर्मों का सम्मान करती है और कर्मचारियों को अपने धार्मिक प्रतीक पहनने की पूरी स्वतंत्रता है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रही जानकारी पूरी तरह सही नहीं है और कंपनी की नीतियों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
हालांकि, कंपनी की इस सफाई के बावजूद विवाद पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। कई संगठन और लोग अभी भी इस मुद्दे पर अपनी नाराजगी जता रहे हैं और स्पष्ट नीति की मांग कर रहे हैं।
यह पूरा घटनाक्रम इस बात को दर्शाता है कि भारत जैसे विविधता भरे देश में धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दे कितने संवेदनशील होते हैं। किसी भी संस्था या कंपनी को अपनी नीतियां बनाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना होता है कि वह सभी समुदायों की भावनाओं का सम्मान करे।
वहीं दूसरी ओर, इस तरह के विवाद सोशल मीडिया के प्रभाव को भी उजागर करते हैं, जहां किसी भी जानकारी के वायरल होते ही वह व्यापक बहस का विषय बन जाती है। ऐसे में जरूरी है कि तथ्यों की पुष्टि के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाए।
कुल मिलाकर, यह मामला केवल एक कंपनी की नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक स्तर पर सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक संवेदनशीलता से जुड़ा हुआ है, जिस पर संतुलित और जिम्मेदार दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।