विधवा से शादी करने पर दंपती का बहिष्कार: पंगत की शर्त ठुकराने पर चितौरा गांव में सामाजिक दबाव, कलेक्टर से लगाई गुहार !

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सागर। जिले के चितौरा गांव से सामाजिक भेदभाव और कुप्रथाओं का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक युवक को विधवा महिला से विवाह करना भारी पड़ गया। समाज के कुछ लोगों और कथित मुखिया द्वारा दंपती का बहिष्कार कर दिया गया और उन्हें समाज में दोबारा शामिल करने के लिए कच्ची-पक्की पंगत (भोज) कराने की शर्त रखी गई। इस मानसिक प्रताड़ना से परेशान होकर पीड़ित दंपती ने कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर न्याय की गुहार लगाई है।

पीड़ित युवक राजेंद्र पटेल ने अपनी शिकायत में बताया कि लगभग आठ महीने पहले उन्होंने शासन की मुख्यमंत्री कल्याणी विवाह सहायता योजना के तहत एक विधवा महिला से विवाह किया था। महिला के पहले पति का वर्ष 2021 में निधन हो चुका था और उसकी एक छोटी बेटी भी है, जिसे राजेंद्र ने अपनाकर अपने परिवार का हिस्सा बना लिया। उनका कहना है कि यह विवाह पूरी तरह से सामाजिक और कानूनी रूप से वैध है, लेकिन गांव के कुछ लोगों को यह स्वीकार नहीं है।

राजेंद्र के अनुसार, विवाह के बाद से ही समाज के कुछ प्रभावशाली लोगों ने उन पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। आरोप है कि समाज के मुखिया ने साफ तौर पर कहा कि अगर उन्हें समाज में रहना है तो पहले “कच्ची पंगत” और फिर “पक्की पंगत” पूरे समाज को करानी होगी। यह एक तरह की सामाजिक सजा के रूप में थोपी गई शर्त थी। जब दंपती ने आर्थिक और नैतिक आधार पर इस शर्त को मानने से इनकार किया, तो उनके खिलाफ बहिष्कार का फैसला ले लिया गया।

बहिष्कार के बाद दंपती का सामाजिक जीवन पूरी तरह प्रभावित हो गया है। उन्हें गांव के किसी भी सामाजिक, धार्मिक या पारिवारिक कार्यक्रम में आमंत्रित नहीं किया जाता। यहां तक कि गांव में सामान्य मेलजोल भी बंद कर दिया गया है। दंपती का कहना है कि यह व्यवहार न केवल अमानवीय है, बल्कि उनके मौलिक अधिकारों का भी उल्लंघन है।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस सामाजिक बहिष्कार का असर मासूम बच्ची पर भी पड़ रहा है। दंपती का आरोप है कि उनकी पत्नी की बेटी को गांव के अन्य बच्चों के साथ खेलने नहीं दिया जाता और उसे भी अलग-थलग कर दिया गया है। इससे बच्ची के मानसिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

पीड़ित दंपती ने कलेक्टर से मांग की है कि इस मामले में हस्तक्षेप कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए और उन्हें सुरक्षित एवं सम्मानजनक सामाजिक वातावरण उपलब्ध कराया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की कुप्रथाओं को रोकना प्रशासन की जिम्मेदारी है, ताकि भविष्य में किसी और को इस तरह की प्रताड़ना का सामना न करना पड़े।

यह मामला समाज में व्याप्त उन रूढ़िवादी सोच और परंपराओं को उजागर करता है, जो आज भी विधवा विवाह जैसे सामाजिक रूप से स्वीकृत और प्रोत्साहित किए जाने वाले कदमों के खिलाफ खड़ी हैं। जबकि सरकार विभिन्न योजनाओं के माध्यम से विधवा विवाह को बढ़ावा दे रही है, वहीं जमीनी स्तर पर इस तरह की घटनाएं चिंता का विषय हैं।

प्रशासनिक स्तर पर अब इस मामले में क्या कार्रवाई होती है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इस तरह की सामाजिक कुरीतियां आगे भी लोगों के जीवन को प्रभावित करती रहेंगी।

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