भोपाल,
मध्यप्रदेश में किसानों के प्रस्तावित आंदोलन से पहले ही प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाते हुए कई जिलों में किसान नेताओं को ‘हाउस अरेस्ट’ (नजरबंद) कर दिया है। राजधानी भोपाल की ओर कूच करने की तैयारी कर रहे किसानों को रास्ते में ही रोक दिया गया, जबकि कई नेताओं को उनके घरों से बाहर निकलने तक नहीं दिया गया। इस कार्रवाई के बाद प्रदेश की सियासत गरमा गई है और किसान संगठनों ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बताया है।
आंदोलन शुरू होने से पहले ही प्रशासन की घेराबंदी
‘राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ’ के बैनर तले प्रदेशभर के किसान नेता भोपाल में मुख्यमंत्री निवास पहुंचकर अपनी मांगों को रखने वाले थे। इसके लिए फंदा टोल नाके पर एकत्रित होने की रणनीति बनाई गई थी। लेकिन पुलिस और प्रशासन ने इस योजना की भनक लगते ही पहले से ही सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी।
देवास, रतलाम, सीहोर, सिवनी, हरदा, बालाघाट, मंदसौर, नीमच, उज्जैन, शाजापुर, आगर मालवा सहित करीब एक दर्जन से अधिक जिलों में किसान नेताओं को नजरबंद कर दिया गया। कई जगहों पर पुलिस सुबह से ही नेताओं के घरों के बाहर तैनात रही, जिससे वे बाहर नहीं निकल सके।

नेताओं का आरोप—“घर में कैद कर दिया गया”
महासंघ की युवा इकाई के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष त्रिलोक सिंह गोठी ने आरोप लगाया कि उन्हें सुबह से ही घर से बाहर नहीं निकलने दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि करीब 30 जिलों से किसान भोपाल आने वाले थे, लेकिन प्रशासन ने उन्हें रोकने के लिए हर संभव प्रयास किया।
गोठी के मुताबिक, “हम शांतिपूर्ण तरीके से मुख्यमंत्री को अपनी समस्याएं बताने जा रहे थे, लेकिन हमें घरों में कैद कर दिया गया। यह किसानों की आवाज दबाने का प्रयास है।”
रास्तों पर भी सख्ती, कई किसान रोके गए
जो किसान घरों से निकल चुके थे, उन्हें भी रास्तों में रोक दिया गया। सीहोर जिले के आष्टा के पास किसानों को रोकने की खबर सामने आई, वहीं भोपाल के पॉलीटेक्निक चौराहे पर कुछ किसान पुलिस को चकमा देकर पहुंच गए और विरोध प्रदर्शन किया।
राजधानी में जगह-जगह पुलिस बल तैनात किया गया था, ताकि किसी भी तरह की भीड़ को नियंत्रित किया जा सके। प्रशासन का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना उनकी प्राथमिकता है और बिना अनुमति किसी भी बड़े जमावड़े की अनुमति नहीं दी जा सकती।
15 सूत्रीय मांगों को लेकर आंदोलन
किसान मजदूर महासंघ ने मुख्यमंत्री के नाम 15 सूत्रीय मांगों का ज्ञापन तैयार किया है, जिसमें किसानों की कई ज्वलंत समस्याओं को उठाया गया है। इन मांगों में सबसे प्रमुख मुद्दा गेहूं खरीदी में आ रही बाधाओं को दूर करना है।
किसानों का कहना है कि सरकारी खरीदी प्रक्रिया में देरी और अव्यवस्थाओं के कारण उन्हें मजबूरन मंडियों में कम दाम पर फसल बेचनी पड़ रही है। ऐसे किसानों को ‘भावांतर योजना’ के तहत मुआवजा देने की मांग भी की गई है।

कर्जमाफी और समर्थन मूल्य पर जोर
किसानों की प्रमुख मांगों में पूर्ण कर्जमाफी भी शामिल है। उनका कहना है कि सरकारी नीतियों और बाजार की अस्थिरता के कारण उन्हें फसलों का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है, जिससे वे कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे हैं।
इसके अलावा, फसलों के दाम ‘सी-250’ लागत फार्मूले के आधार पर तय करने की मांग भी उठाई गई है, ताकि किसानों को उनकी लागत से अधिक उचित लाभ मिल सके।
पराली और कानूनी मामलों पर राहत की मांग
महासंघ ने पराली जलाने के मामलों में दर्ज केस वापस लेने की मांग भी की है। किसानों का कहना है कि सैटेलाइट रिपोर्ट के आधार पर की गई कार्रवाई कई बार गलत होती है और निर्दोष किसानों को परेशान किया जाता है।
इसके साथ ही, डिफाल्टर किसानों को दोबारा ऋण सुविधा देने और सहकारी संस्थाओं में भुगतान की अंतिम तारीख बढ़ाने की भी मांग की गई है।
प्राकृतिक आपदा और मुआवजा
किसानों ने आगजनी और प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान को 100% मानते हुए तत्काल राहत और फसल बीमा का लाभ देने की मांग की है। उनका कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में मुआवजा मिलने में देरी होती है और कई बार पूरा नुकसान कवर नहीं हो पाता।

दूध के दाम और पशुपालकों के मुद्दे
आंदोलन में पशुपालकों के मुद्दों को भी शामिल किया गया है। किसानों ने दूध का रेट 12 रुपए प्रति किलो फैट करने और सरकार द्वारा घोषित 5 रुपए प्रति लीटर बोनस राशि का जल्द भुगतान करने की मांग की है।
जमीन और अधिग्रहण से जुड़े मुद्दे
किसानों ने जमीन अधिग्रहण के मामलों में उचित मुआवजा देने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि किसी परियोजना के लिए जमीन ली जाती है, तो बाजार दर से 10 गुना अधिक मुआवजा दिया जाना चाहिए।
इसके अलावा, भूमि रिकॉर्ड में सुधार और किसानों के आवेदनों का समय पर निराकरण करने की भी मांग उठाई गई है।
बिजली, खाद और लैब की मांग
किसानों ने बिजली विभाग की मनमानी पर रोक लगाने, खाद वितरण में सुधार करने और हर जिले में खाद एवं मिट्टी परीक्षण के लिए सरकारी लैब स्थापित करने की मांग की है।
प्रशासन का पक्ष
प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि किसी भी बड़े आंदोलन से पहले अनुमति लेना जरूरी होता है। बिना अनुमति राजधानी में भीड़ इकट्ठा होने से कानून-व्यवस्था बिगड़ सकती है, इसलिए एहतियातन कदम उठाए गए हैं।
राजनीतिक हलचल तेज
इस पूरे घटनाक्रम के बाद प्रदेश की राजनीति भी गरमा गई है। विपक्ष ने सरकार पर किसानों की आवाज दबाने का आरोप लगाया है, जबकि सत्तापक्ष का कहना है कि शांति और व्यवस्था बनाए रखना प्राथमिकता है।
किसानों में बढ़ता असंतोष
लगातार बढ़ती लागत, फसलों के उचित दाम न मिलना, प्राकृतिक आपदाएं और प्रशासनिक जटिलताओं के कारण किसानों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। ऐसे में इस तरह की सख्ती से हालात और बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है।
फिलहाल प्रशासन की सख्ती के चलते यह आंदोलन पूरी तरह से आकार नहीं ले सका, लेकिन किसान संगठनों ने साफ कर दिया है कि वे अपनी मांगों को लेकर पीछे नहीं हटेंगे। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और बड़ा रूप ले सकता है।
कुल मिलाकर, यह मामला केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि किसानों की जमीनी समस्याओं और उनकी आवाज के बीच टकराव का प्रतीक बन गया है। अब देखना होगा कि सरकार और किसान संगठनों के बीच संवाद होता है या यह टकराव आगे और गहराता है।