दमोह जिला न्यायालय में शनिवार को आयोजित नेशनल लोक अदालत में एक परिवार फिर से टूटने से बच गया। कुटुंब न्यायालय में न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं की समझाइश के बाद पति-पत्नी ने अपने लंबे समय से चले आ रहे विवाद को खत्म करते हुए आपसी सहमति से राजीनामा कर लिया। दोनों ने पुराने मतभेद भुलाकर फिर से साथ रहने का फैसला किया। इस सुलह के बाद परिवार और न्यायालय परिसर में सकारात्मक माहौल देखने को मिला।
जानकारी के अनुसार यह विवाद लाडली बहना योजना के तहत मिलने वाली राशि और इलाज के खर्च को लेकर शुरू हुआ था। दमोह निवासी सुनीता प्रजापति की शादी करीब दस वर्ष पहले बारी गांव निवासी मुकेश प्रजापति से हुई थी। दोनों के दो बच्चे भी हैं। शुरुआती वर्षों में परिवार सामान्य रूप से चल रहा था, लेकिन बाद में आर्थिक मामलों को लेकर दोनों के बीच तनाव बढ़ने लगा।
बताया गया कि सुनीता प्रजापति को मध्यप्रदेश सरकार की लाडली बहना योजना के तहत आर्थिक सहायता राशि मिलती थी। इसी बीच उनके इलाज का खर्च भी सामने आया। आरोप है कि इलाज के लिए पैसे देने को लेकर पति मुकेश प्रजापति ने असहमति जताई, जिसके बाद दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। मामला इतना बढ़ा कि घर में झगड़े और मारपीट की स्थिति बन गई।

सुनीता प्रजापति के अनुसार विवाद के दौरान उनके साथ मारपीट भी हुई थी। इसके बाद वह नाराज होकर वर्ष 2024 में अपने मायके दमोह आकर रहने लगीं। पति-पत्नी के बीच दूरियां लगातार बढ़ती गईं और अंततः वर्ष 2025 में मामला न्यायालय तक पहुंच गया। परिवार के टूटने की स्थिति बनने के बाद दोनों पक्षों के बीच कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई।
शनिवार को आयोजित नेशनल लोक अदालत में इस मामले को कुटुंब न्यायालय में रखा गया। यहां न्यायाधीश मोहम्मद अजहर, अधिवक्ताओं और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के अधिकारियों ने दोनों पक्षों को समझाइश दी। काफी देर तक चली बातचीत और काउंसलिंग के बाद दोनों ने अपनी गलतफहमियों को दूर करने का निर्णय लिया।

न्यायाधीश मोहम्मद अजहर ने बताया कि विवाद की मुख्य वजह आर्थिक मामलों को लेकर बनी नाराजगी थी। छोटी-छोटी बातों ने धीरे-धीरे बड़ा रूप ले लिया और मामला न्यायालय तक पहुंच गया। उन्होंने कहा कि आपसी समझ और संवाद से परिवार को टूटने से बचाया जा सकता है। लोक अदालत का उद्देश्य भी यही है कि परिवारों में सुलह हो और रिश्ते फिर से मजबूत बनें।
काफी समझाइश के बाद पति-पत्नी ने एक-दूसरे के साथ रहने की सहमति जताई और आपसी राजीनामा कर लिया। राजीनामा होने के बाद सुनीता प्रजापति ने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि परिवार को बचाने के लिए छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि गुस्से और गलतफहमी में लिए गए फैसले परिवारों को तोड़ देते हैं, इसलिए हर पति-पत्नी को धैर्य और समझदारी से काम लेना चाहिए।

लोक अदालत में मौजूद अधिवक्ताओं ने भी इस सुलह को सकारात्मक पहल बताया। उनका कहना था कि ऐसे मामलों में बातचीत और समझाइश से कई परिवार टूटने से बच सकते हैं। इस तरह के समझौते समाज के लिए भी अच्छा संदेश देते हैं।
इस दौरान जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के अधीक्षक एवं जिला प्रिंसिपल सुभाष सोलंकी, लीगल काउंसिल अधिवक्ता मनीष नगाइच, जिला अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष कमलेश भारद्वाज सहित अन्य अधिवक्ता और न्यायालय कर्मचारी उपस्थित रहे।
नेशनल लोक अदालत में हुए इस समझौते को लेकर न्यायालय परिसर में भी चर्चा रही। लोगों ने इसे परिवार और रिश्तों को बचाने की दिशा में एक अच्छी पहल बताया। न्यायाधीशों ने भी कहा कि छोटी-छोटी बातों को लेकर परिवारों में दूरियां नहीं बढ़नी चाहिए और संवाद के जरिए हर विवाद का समाधान संभव है।