सागर।
पितृपक्ष का पावन अवसर हो और सागर की ऐतिहासिक लाखा बंजारा झील पर आस्था का संगम न दिखाई दे, ऐसा कैसे हो सकता है। बुधवार सुबह से ही झील के घाटों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी, जहां लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना के लिए तर्पण और पिंडदान की क्रियाएं करते नजर आए। वैदिक मंत्रों की ध्वनि और आस्था की लहरों से झील का वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक हो गया।

पितृपक्ष का महत्व
हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक का समय पितृपक्ष कहलाता है। यह 16 दिन पूर्वजों की स्मृति और उनकी आत्मा की शांति के लिए समर्पित होते हैं। मान्यता है कि इन दिनों पितृ धरती पर आते हैं और अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं।
धार्मिक दृष्टि से पितृपक्ष में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करना पुत्र का सबसे बड़ा कर्तव्य माना गया है। इसका उद्देश्य यह है कि पूर्वज विस्मृत न हों और उनके आशीर्वाद से परिवार समृद्ध और धर्मनिष्ठ बना रहे।
घाटों पर सुबह से जुटे श्रद्धालु
सागर की लाखा बंजारा झील पर तड़के से ही श्रद्धालु परिवारों के साथ पहुंचने लगे। हर घाट पर पंडित विधि-विधान से तर्पण की क्रिया करा रहे थे। जल में खड़े होकर लोग कुशा, तिल और दूध से पूर्वजों को जलांजलि दे रहे थे।
वातावरण में मंत्रोच्चारण और श्रद्धालुओं की आस्था से भरी प्रार्थनाओं की गूंज थी। महिलाएं, पुरुष और बच्चे मिलकर इस धार्मिक पर्व का हिस्सा बने।

पंडितों की व्याख्या – क्यों जरूरी है तर्पण
पुरव्याऊ टौरी निवासी पंडित दिनेश नारायण दुबे बताते हैं कि वे तीन पीढ़ियों से इस परंपरा को निभा रहे हैं। उनके अनुसार –
- तर्पण करने से पितरों की आत्मा को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- यह केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं बल्कि नई पीढ़ी को संस्कार देने का माध्यम है।
- श्राद्ध से सात पीढ़ियों तक धर्म और आस्था की परंपरा जीवित रहती है।
- तर्पण करने से परिवार में सुख-समृद्धि आती है और प्रेतबाधा दूर होती है।
नई पीढ़ी के लिए सीख
इस अवसर पर बड़ी संख्या में युवा और बच्चे भी अपने परिजनों के साथ मौजूद रहे। विशेषज्ञों का कहना है कि जब बच्चे देखते हैं कि उनके माता-पिता अपने पितरों का तर्पण कर रहे हैं, तो वे भी इस परंपरा को अपनाने के लिए प्रेरित होते हैं। यह पर्व केवल आस्था नहीं बल्कि संस्कारों की निरंतरता का प्रतीक है।

नदियों और तालाबों पर दिखा धार्मिक उत्साह
सागर झील के अलावा जिले के अन्य तालाबों और नदियों के घाटों पर भी सुबह से ही श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। हर जगह परंपरागत तरीके से पिंडदान और तर्पण की क्रियाएं हुईं।
निष्कर्ष
पितृपक्ष का यह पर्व न केवल पूर्वजों को याद करने और उनकी आत्मा की शांति के लिए किया जाता है, बल्कि यह समाज को यह भी संदेश देता है कि परिवार और संस्कार तभी जीवित रहते हैं जब नई पीढ़ी अपने मूल और परंपराओं से जुड़ी रहती है।