जबलपुर की शिवराज बस्ती में ‘मकान बिकाऊ है’ पोस्टरों से मचा हंगामा

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जबलपुर। शहर की शिवराज बस्ती इन दिनों चर्चा का केंद्र बनी हुई है। बस्ती के कई मकानों के बाहर अचानक “यह मकान बिकाऊ है” लिखे पोस्टर चिपकने लगे, जिसने स्थानीय लोगों और प्रशासन दोनों को चौंका दिया। इसकी वजह बनी बस्ती में हाल ही में आकर बसने वाले कुछ अनजान परिवार, जिन पर संदेह जताया जा रहा है कि वे या तो बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं या रोहिंग्या मूल के लोग

स्थानीय लोगों के अनुसार, इन नए परिवारों के आने के बाद बस्ती का माहौल बदल गया है। लोगों ने पुलिस और हिंदूवादी संगठनों से शिकायत की। पुलिस जांच में सामने आया कि करीब 10 से ज्यादा परिवारों के 50 लोग यहां झोपड़ियां बनाकर या किराए पर कमरा लेकर रह रहे हैं।


बस्ती में असुरक्षा का माहौल, मकान छोड़ने लगे लोग

रहवासियों का कहना है कि अचानक बढ़ती संख्या से बस्ती में डर और असुरक्षा का माहौल बन गया है। कई परिवारों ने अपने घरों पर ताले डाल दिए और दूसरी जगह शिफ्ट हो गए।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि ये लोग न केवल गंदगी फैला रहे हैं, बल्कि संदिग्ध गतिविधियों में भी लिप्त रहते हैं।

  • दिनभर भीख मांगना,
  • मोहल्ले में मांस के टुकड़े फेंकना,
  • घरों की रैकी करना और चोरी की आशंका,
  • विरोध करने पर गाली-गलौज और महिलाओं को अर्धनग्न खड़ा करना – ऐसी शिकायतें भी सामने आई हैं।

हिंदूवादी संगठनों की एंट्री, पुलिस से की शिकायत

जैसे ही मामला सामने आया, बजरंग दल के कार्यकर्ता बस्ती में पहुंचे और पुलिस को लिखित शिकायत सौंपी।
बजरंग दल प्रचारक रमेश तिवारी ने आरोप लगाया कि इन लोगों ने मुख्य मार्ग पर इतनी गंदगी फैला दी है कि निकलना मुश्किल हो गया है। उन्होंने कहा –
“हम किसी को जबरन बेघर नहीं कर रहे, लेकिन जो लोग बिना दस्तावेजों के रह रहे हैं, गंदगी फैला रहे हैं, उन्हें यहां रहने नहीं दिया जाएगा।”

उनका कहना है कि कई लोगों ने झोपड़ियां बना ली हैं, तो कुछ 2 हजार रुपये तक किराया देकर कमरों में रह रहे हैं।


दो गुटों में बंटे बस्तीवासी

बस्ती में इस मुद्दे को लेकर लोग दो गुटों में बंट गए हैं।

  • पहला गुट: जो मकान मालिक हैं और कमरा किराए पर देकर आय अर्जित कर रहे हैं, वे इन नए लोगों को हटाने का विरोध कर रहे हैं।
  • दूसरा गुट: जो रहवासी खुद प्रभावित हो रहे हैं, वे इनकी मौजूदगी का खुलकर विरोध कर रहे हैं और कहते हैं कि अगर इन्हें अभी नहीं हटाया गया तो आगे बड़ी समस्या हो जाएगी।

कमला बैन नाम की स्थानीय महिला का कहना है कि उन्हें इन लोगों के रहने से कोई परेशानी नहीं है। उनका कहना है –
“ये लोग अपना कमाते-खाते हैं। बस कुछ लोग इन्हें बदनाम कर रहे हैं।”


खुद को पुराना निवासी बता रही उर्मिला पादरे

शिवराज बस्ती में रह रही महिला उर्मिला पादरे ने दावा किया कि वह और उसका परिवार कई सालों से जबलपुर में रह रहा है। पहले वे ग्वारीघाट रेलवे स्टेशन के पास रहते थे, वहां से हटाए जाने के बाद यहां आ गए।
उसने कहा –
“हमसे चोरी करने वाले, गंदगी फैलाने वाले कहा जाता है। पुलिस का दबाव बनाया जा रहा है। हमारी झोपड़ी जिस जमीन पर है, वहां मालिक की परमिशन से रह रहे हैं। आधार कार्ड भी था, लेकिन बारिश में बह गया।”


पुलिस की कार्रवाई – दस्तावेजों की जांच

शिकायत के बाद जब मामला जबलपुर एसपी संपत उपाध्याय तक पहुंचा तो उन्होंने ग्वारीघाट टीआई को जांच के निर्देश दिए।

टीआई सुभाषचंद्र बघेल ने बताया कि मौके पर पहुंचने के बाद अवैध झोपड़ियों को हटाने की कार्रवाई की जा रही है। जांच में यह भी सामने आया कि ये लोग महाराष्ट्र के गोंदिया जिले से आए खानाबदोश परिवार हैं, न कि विदेशी घुसपैठिए।

टीआई बघेल का कहना है –
“इनके दस्तावेजों की जांच कराई गई। कई के पास पहचान पत्र मिले हैं, कुछ के पास नहीं। जिनके पास दस्तावेज नहीं हैं, उन्हें हटाया जा रहा है।”


बड़ा सवाल – पहचान और दस्तावेज

यह पूरा विवाद इस बात पर टिका है कि आखिर शिवराज बस्ती में रहने वाले नए लोग कौन हैं?

  • अगर ये वाकई बांग्लादेशी या रोहिंग्या हैं, तो यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ सकता है।
  • अगर ये महाराष्ट्र के खानाबदोश परिवार हैं, तो इन्हें पुनर्वास की जरूरत होगी।
  • सबसे अहम बात – क्या इनके पास आधार, राशन कार्ड या अन्य पहचान पत्र वैध रूप से बने हैं? अगर हां, तो कैसे?

निष्कर्ष

शिवराज बस्ती का यह विवाद अब प्रशासनिक और राजनीतिक रंग लेता दिख रहा है।

  • एक ओर स्थानीय लोग और हिंदूवादी संगठन हैं, जो इन्हें अवैध घुसपैठिए मानकर हटाने की मांग कर रहे हैं।
  • दूसरी ओर, खुद को पीड़ित बताने वाले वे परिवार हैं, जो कहते हैं कि वे वर्षों से यहीं रह रहे हैं और अपनी जीविका के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

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