बुंदेलखंड की पारंपरिक शस्त्र कला ‘अखाड़ा’ को नई पहचान दिलाने वाले प्रख्यात कलाकार भगवानदास रायकवार ‘दाऊ’ का 83 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने AIIMS Bhopal में अंतिम सांस ली, जहां वे पिछले कई दिनों से गंभीर रूप से बीमार थे और वेंटिलेटर पर उनका उपचार चल रहा था। उनके निधन की पुष्टि उनके पुत्र राजकुमार रायकवार ने की।
उनके निधन से न केवल सागर जिले बल्कि पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए उन्हें कला जगत की अपूरणीय क्षति बताया।
बीमारी के बाद भोपाल में चल रहा था इलाज
जानकारी के अनुसार, भगवानदास रायकवार की तबीयत बिगड़ने पर उन्हें 17 मार्च को सागर के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जब उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ, तो 7 अप्रैल को उन्हें भोपाल स्थित AIIMS Bhopal रेफर किया गया। वहां वे लगातार वेंटिलेटर पर थे और उपचार के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली।

16 साल की उम्र से शुरू किया अखाड़ा
भगवानदास रायकवार ने महज 16 वर्ष की आयु में अखाड़ा कला सीखना शुरू कर दिया था। उस समय यह कला केवल पारंपरिक आयोजनों और ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित थी, लेकिन उन्होंने इसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
शुरुआत में वे सागर में एक सरकारी बैंक में नौकरी करते थे, लेकिन अखाड़ा के प्रति उनके समर्पण के चलते वे अक्सर प्रशिक्षण के लिए बाहर जाते थे। नौकरी के कारण वे इस कला को पूरा समय नहीं दे पा रहे थे।
अखाड़ा के लिए छोड़ दी बैंक की नौकरी
अपने जुनून को प्राथमिकता देते हुए भगवानदास रायकवार ने वर्ष 1998 में बैंक की नौकरी से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन अखाड़ा कला के संरक्षण, संवर्धन और प्रशिक्षण में समर्पित कर दिया।
यह निर्णय उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ, जिसने उन्हें देश-विदेश में पहचान दिलाई।
‘बंदिश’ शैली के थे माहिर
भगवानदास रायकवार अखाड़ा की ‘बंदिश’ शैली के उस्ताद माने जाते थे। इस अनोखी तकनीक में वे लाठी के माध्यम से किसी भी व्यक्ति को इस तरह नियंत्रित कर लेते थे कि वह खुद को छुड़ा नहीं पाता था। यह शैली उनकी विशेष पहचान बन गई थी।
उनकी इस कला ने न केवल लोगों को आकर्षित किया, बल्कि पारंपरिक मार्शल आर्ट को एक नई पहचान भी दिलाई।
बेटियों को सिखाई आत्मरक्षा
भगवानदास रायकवार ने अपने जीवन में हजारों युवाओं को प्रशिक्षण दिया, जिसमें बड़ी संख्या में बेटियां भी शामिल थीं। उन्होंने महिलाओं को आत्मरक्षा के गुर सिखाकर उन्हें सशक्त बनाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
उन्होंने देश के कई हिस्सों जैसे हिमाचल प्रदेश, जयपुर, लखनऊ, नागपुर, मुंबई और यहां तक कि रूस में भी प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए। उनके शिष्य आज देशभर में अखाड़ा कला को आगे बढ़ा रहे हैं।
2026 में मिला पद्मश्री सम्मान
उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने जनवरी 2026 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा। यह सम्मान उन्हें भारतीय पारंपरिक मार्शल आर्ट के संरक्षण और प्रचार-प्रसार में उनके योगदान के लिए दिया गया।
यह उनके जीवन भर के संघर्ष और समर्पण का सबसे बड़ा सम्मान था।

सीमित संसाधनों में किया बड़ा काम
भगवानदास रायकवार ने सीमित संसाधनों के बावजूद अखाड़ा कला को जीवित रखा। उन्होंने कभी सुविधाओं की कमी को अपने मार्ग में बाधा नहीं बनने दिया और निरंतर इस परंपरा को आगे बढ़ाते रहे।
उनके शिष्यों और अनुयायियों की संख्या आज पूरे देश में फैली हुई है, जो उनके द्वारा सिखाई गई कला को आगे बढ़ा रहे हैं।
क्षेत्र में शोक की लहर
उनके निधन की खबर से सागर और आसपास के क्षेत्रों में शोक की लहर है। कला प्रेमियों, खिलाड़ियों और सामाजिक संगठनों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है।
भगवानदास रायकवार का जीवन समर्पण, संघर्ष और परंपरा के संरक्षण का प्रतीक रहा है। उन्होंने न केवल अखाड़ा कला को जीवित रखा, बल्कि उसे अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया।
उनका निधन निश्चित ही कला जगत के लिए एक बड़ी क्षति है, लेकिन उनके द्वारा दी गई शिक्षा और उनके शिष्य इस परंपरा को आगे बढ़ाते रहेंगे। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।