ग्वालियर: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ (युगल पीठ) ने एमपी हाउसिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बोर्ड की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए डीडी नगर स्थित अटल कुंज रिहायशी परियोजना के लिए जारी किए गए नए टेंडर पर अंतरिम रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि जिस अधिकारी की भूमिका को पूर्व आदेश में गड़बड़ी का मुख्य कारण माना गया था, उसके खिलाफ ठोस कार्रवाई करने के बजाय किसी अन्य अधिकारी को निलंबित करना न्यायसंगत नहीं है।
गलत अधिकारी पर कार्रवाई, असली जिम्मेदारी से बचाव: कोर्ट
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अतिरिक्त आयुक्त-I की भूमिका संदिग्ध पाए जाने के बावजूद उसकी जिम्मेदारी तय नहीं की गई। इसके बजाय ग्वालियर के कार्यपालन यंत्री को निलंबित कर दिया गया, जबकि वह वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों का पालन कर रहा था।
कोर्ट ने इस पर कड़ा असंतोष जताते हुए कहा कि इस तरह की कार्रवाई से यह संदेश जाता है कि वास्तविक जिम्मेदारी तय करने से बचा जा रहा है, जो प्रशासनिक जवाबदेही की भावना के विपरीत है।

नीरू राजपूत के निलंबन पर भी लगी रोक
इसी मामले में हाईकोर्ट की एकल पीठ ने कार्यपालन यंत्री नीरू राजपूत के निलंबन आदेश पर भी रोक लगा दी है। कोर्ट ने माना कि जब वरिष्ठ अधिकारियों के निर्णयों के तहत काम किया गया हो, तो अधीनस्थ अधिकारी को दंडित करना अनुचित है।
गौरतलब है कि डीडी नगर में लगभग 65 करोड़ रुपए की लागत से अटल कुंज रिहायशी कॉम्प्लेक्स का निर्माण प्रस्तावित है, जिसकी निविदा शर्तों में बार-बार बदलाव को लेकर पहले से ही विवाद चल रहा है।
पुनः टेंडर प्रक्रिया को हाईकोर्ट में दी गई चुनौती
मामले में प्रैगमैटिक इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड ने पुनः टेंडर जारी करने की प्रक्रिया को हाईकोर्ट में चुनौती दी है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि बोर्ड के अतिरिक्त आयुक्त (2) द्वारा 15 जनवरी 2026 को जारी आदेश में स्वयं यह स्वीकार किया गया था कि पूर्व निविदा प्रक्रिया भ्रम और गलत निर्णयों के कारण दूषित हो गई थी।
इसके बावजूद एल-1 बोलीदाता को ठेका देने या प्रक्रिया में आवश्यक सुधार करने के बजाय फ्रेश बिडिंग के निर्देश देना मनमाना और अनुचित है।
याचिकाकर्ता को संभावित नुकसान पर कोर्ट गंभीर
याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि नए टेंडर से उसकी प्रतिस्पर्धी बोली संबंधी जानकारी सार्वजनिक हो गई है, जिससे भविष्य की निविदाओं में उसे गंभीर आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को गंभीरता से स्वीकार करते हुए कहा कि 16 अक्टूबर 2025 को पारित पूर्व आदेश में निविदा प्रक्रिया की अनियमितताओं और विसंगतियों को पहले ही विस्तार से रेखांकित किया जा चुका है। इसके बावजूद बोर्ड द्वारा समग्र और जिम्मेदाराना दृष्टिकोण न अपनाना चिंताजनक है।
अगली सुनवाई तक किसी कार्रवाई पर रोक
कोर्ट ने 15 जनवरी 2026 के विवादित आदेश के प्रभाव और क्रियान्वयन पर अगली सुनवाई तक रोक लगाते हुए निर्देश दिए हैं कि एमपी हाउसिंग बोर्ड न्यायालय की अनुमति के बिना कोई भी आगे की कार्रवाई नहीं करेगा।
साथ ही, कोर्ट ने हाउसिंग बोर्ड के आयुक्त को शपथपत्र के साथ जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें यह स्पष्ट करना होगा कि नया टेंडर जारी करना सार्वजनिक धन और संसाधनों के हित में कैसे उचित है।