इंदौर में कृषि नवाचार की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए, एरोपोनिक्स पद्धति से आलू के बीज तैयार किए जा रहे हैं। इस तकनीक में आलू के पौधे की जड़ें मिट्टी में नहीं, बल्कि हवा में रहती हैं, जिससे उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। यही वजह है कि जहां सामान्य पद्धति में एक पौधे की जड़ में 5–6 आलू लगते हैं, वहीं एरोपोनिक तकनीक से 60–65 आलू तक तैयार हो रहे हैं।
रोग-मुक्त और हाई-यील्डिंग बीज—खर्च कम, मुनाफा 10–12 गुना तक
इस तकनीक से तैयार होने वाले आलू के बीज पूरी तरह वायरस-फ्री होते हैं।
➡️ इससे किसानों का
- खाद,
- पानी
- पेस्टिसाइड
पर होने वाला खर्च काफी कम होगा।
विशेषग्यों का दावा है कि वायरस-मुक्त बीजों से पैदावार कई गुना बढ़ने के कारण किसानों की आय 10–12 गुना तक बढ़ सकती है। हालांकि इन बीजों को किसानों तक बड़े पैमाने पर पहुंचने में थोड़ा समय लगेगा।



इंदौर कृषि कॉलेज में तैयार अत्याधुनिक एरोपोनिक लैब
इंदौर स्थित कृषि कॉलेज में एक हाई-टेक एरोपोनिक लैब स्थापित की गई है, जिससे अंचल के किसानों के लिए उन्नत किस्म के आलू बीजों का व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन किया जा सकेगा।
डॉ. अंकिता साहू, असिस्टेंट प्रोफेसर व यूनिट प्रभारी ने बताया—
➡️ बीज तैयार करने के लिए आलू के तने के बेहद पतले हिस्से (स्टेम) को पौधे के रूप में विकसित किया जाता है।
➡️ पौधे की जड़ें हवा में लटकी रहती हैं और पौधों को पोषक तत्व फॉग सिस्टम से दिए जाते हैं।
इंदौर से पहले ऐसी ही यूनिट ग्वालियर और सिहोर में संचालित हो रही हैं।
एरोपोनिक बीज क्यों हैं खास?
डॉ. अंकिता साहू के अनुसार—
- चूंकि ये पौधे मिट्टी के संपर्क में नहीं आते, इसलिए इनमें वायरस और रोग लगने की आशंका लगभग शून्य होती है।
- खेतों में लगाने के बाद भी ये पौधे रोग-प्रतिरोधी रहते हैं।
- किसानों को कीटनाशकों के छिड़काव की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे लागत भी कम होती है।
इस तकनीक से तैयार बीज खेती का स्वरूप बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।